Saturday, October 31, 2015

तो घट जाएंगी बीएड़ की 1.16 लाख सीटें : सत्र 2016-17 से सिर्फ एक यूनिट (50 सीट) की मान्यता दी जाएगी।

तो घट जाएंगी बीएड़ की 1.16 लाख सीटें : सत्र 2016-17 से सिर्फ एक यूनिट (50 सीट) की मान्यता दी जाएगी।

नेशनल काउंसिल फॉर टीचर एजूकेशन (एनसीटीई) के भूमि, भवन और शिक्षकों की नियुक्ति का मानक पूरा करने में नाकाम यूपी के अलग-अलग बीएड कॉलेजों की करीब एक लाख 16 हजार सीटें कम हो सकती हैं।

यह मानक 31 अक्तूबर तक पूरा किया जाना था लेकिन ज्यादातर कॉलेजों के मानक अधूरे हैं। इस सूची में छत्रपति शाहूजी महाराज यूनिवर्सिटी कैंपस और उससे संबद्ध डिग्री कॉलेजों के नाम भी हैं।

टीचिंग एजूकेशन को प्रभावी बनाने और उसकी गुणवत्ता बढ़ाने के लिए बीएड की मान्यता यूनिट (सीटें) कम कर दी गई हैं। सत्र 2016-17 से सिर्फ एक यूनिट (50 सीट) की मान्यता दी जाएगी।

एक यूनिट पर सात शिक्षक और दो यूनिट (100 सीट) पर 16 शिक्षकों की नियुक्ति करनी होगी। कॉलेज की भूमि, भवन, लैब, लाइब्रेरी, कॉमन रूम का मानक भी 31 अक्तूबर तक दुरुस्त करना था। इसके बावजूद कॉलेजों ने मानक सुधार की प्रक्रिया नहीं शुरू की।

इसकी पुष्टि एनसीटीई के चेयरमैन प्रो. संतोष पांडा ने भी की है। चेयरमैन का कहना है कि यूपी सहित देश के अन्य राज्यों के बीएड कॉलेजों को मानक पूरा करना था। यूपी में 1200 कॉलेजों की करीब एक लाख 41 हजार सीटें हैं।

मानक ठीक नहीं हुआ तो यूपी में एक लाख 16 हजार सीटों की मान्यता खत्म हो जाएगी। 25 हजार सीटों की मान्यता रह जाएगी। ऐसा हुआ तो 2016-17 से बीएड की 25 हजार सीटें ही भरी जा सकेंगी।

मन की बात : शिक्षक के रूप में पहला दिन : बातचीत में एक बात बहुत बढ़िया निकली कि बच्चे मेहनती और प्रयत्नशील........

बच्चों का साथ अच्‍छा लगता है

मैं अपने शिक्षकीय जीवन के पहले दिन को याद करके बहुत रोमांचित हो रहा हूँ। अनुदेशक(शारीरिक शिक्षा) के रूप में मेरी नियुक्ति पूर्व माध्‍यमिक विद्यालय, पल्हरी क्षेत्र नरैनी में हुई थी। यह आज से लगभग दो-ढाई वर्ष पहले की बात है, दिन गुरुवार तारीख 11 जुलाई 2013।

उस दिन रह-रहकर छिटपुट वर्षा हो रही थी। मैं हाथ में अपना नियुक्ति पत्र थामे बारिश के रुकने का इंतजार कर रहा था। वर्षा रुकने का नाम नहीं ले रही थी। स्कूल मेरा पहले से देखा हुआ था। स्कूल मेरी नजरों के सामने घूम रहा था। मैं जल्द से जल्द स्कूल पहुँचकर ज्वाइन करना चाह रहा था। बारिश को न रुकता देख मैं छाता लेकर निकल पड़ा। गाँव के बाहर कुछ दूर जाने पर बारिश का नामोनिशान न था, केवल बादल छाए थे।

मैं स्कूल पहुँचा। सभी बच्चे बरामदे में बैठे हुए थे। वहीं प्रधानाध्यापिका और एक सहायक शिक्षक बैठे हुए थे। मुझे ऐसा प्रतीत हुआ कि क्लास चल रही है। मैंने पहुँचते ही सबको यथोचित अभिवादन कर आने का कारण बताते हुए अपना परिचय दिया। यह जानकर कि मेरी नियुक्ति उनके स्कूल में हो गई है वे बहुत खुश हुए।

प्रधानाध्यापिका ने मुझे कार्यभार ग्रहण कराया। शिक्षक महोदय ने बच्चों से मेरा परिचय कराया। फिर मुझे बच्चों के साथ अकेला छोड़ दिया ताकि मैं अपने स्तर से बच्चों से मिल लूँ। लेकिन ऐसा तो मैंने सोचा ही नहीं था। मैंने स्थिति को सम्‍भालते हुए बच्चों से अपना परिचय एक बार फिर से दिया और बच्चों से भी उनका परिचय देने को कहा। लेकिन लगभग 90 प्रतिशत बच्चे अपना संतोषजनक परिचय नहीं दे  सके। मैंने कुछ विषयगत जानकारी चाही तो पता चला कि गणित और अँग्रेजी के अतिरिक्त उन्हें अन्य विषयों की कोई जानकारी नहीं है, क्योंकि वे विषय ज्यादा नहीं पढ़ाए जाते। कहा जाता है कि गणित और अँग्रेजी कठिन विषय हैं इसलिए इन्हें अच्छी तरह पढ़ और रट लो। शेष विषय अपने आप किताब या गाइड से लिख लो। मैं हैरान था कि ऐसा कैसे हो सकता है। बच्चों का व्यवहारिक ज्ञान और समझ भी  बहुत कमजोर थी। वे केवल यस सर और नो सर बोलना जानते थे। बच्चे अपनी बात सही तरीके से नहीं रख पा रहे थे। बच्चों का शैक्षिक स्तर दयनीय था।

लेकिन बातचीत में एक बात बहुत बढ़िया निकली कि बच्चे मेहनती और प्रयत्नशील हैं। उसका कारण था कि विद्यालय का परिसर बहुत साफ-सुथरा था। हालाँकि वहाँ कोई पेड़-पौधे नहीं थे। सभी बच्चे मिलकर परिसर की सफाई करते थे। नियमित प्रार्थना होती थी। बच्चों में अनुशासन था। लेकिन बातचीत में यह तथ्य भी उभरकर आया कि यह अनुशासन डर के कारण है न कि स्वप्रेरित।

इस तरह मैंने अपने पहले दिन सरकारी स्कूल की सच्ची लेकिन बेरंग तस्‍वीर देख ली थी और मन में संकल्प लिया था कि मैं इसमें जीवन के विविध रंग भरूँगा। आज जब पीछे लौटकर देखता हूँ तो आपने आप को कुछ संतुष्ट पाता हूँ। लेकिन रास्ता बहुत लम्बा है। कदम दर कदम परीक्षा है। मैंने बच्चों को अपना मीत बना लिया है। हम हाथों में हाथ डाले साथ-साथ बढ़ते रहेंगे। मुझे बच्चों का साथ अच्छा लगता है।

~धीरेन्द्र सिंह,अनुदेशक (शारीरिक शिक्षा), पूर्व माध्‍यमिक विद्यालय पल्हरी, क्षेत्र- नरैनी, जिला बांदा, उत्तर प्रदेश। (शिक्षक से अनुभव लिखवाने और टीचर्स ऑफ इण्डिया तक पहुँचाने के लिए हम प्रमोद दीक्षित ‘मलय’ के आभारी हैं।)

मन की बात : एक शिक्षक का पैगाम "शिक्षकों के नाम" ; हर दौर में ऐसे शिक्षक होते हैं जो ‘कुछ बच्चों’ को पूरी क्लास....…..….

क्या आप भी दो-तीन बच्चों को पूरी क्लास समझते हैं?

हर दौर में ऐसे शिक्षक होते हैं जो ‘कुछ बच्चों’ को पूरी क्लास मानते हैं। ऐसी मान्यता शिक्षण प्रक्रिया के लिए एक खतरे के रूप में सामने आती है। इसके कारण कुछ बच्चों का शैक्षिक स्तर और प्रदर्शन तो बेहतर होता है, मगर बाकी बच्चों का क्या होता है? आइए विचार करते हैं।

खास बच्चे’ यानी पूरी क्लास

सबसे पहले बात करते हैं दो-तीन बच्चों पर ध्यान देने के खतरे के बारे में। अगर दो-तीन बच्चे किसी टॉपिक को समझ जाते हैं तो आप मान लेते हैं कि बाकी बच्चों को भी आपकी बात समझ में आ गई है। अगर (भूल से या आदतन) आप भी ऐसा करते हैं तो शायद सतर्क होने की जरूरत है। किसी भी स्कूल में पढ़ाते समय शिक्षण प्रक्रिया की बहुत सी बारीक बातों में कंटेंट, कम्युनिकेशन और चाइल्ड साइकॉलाजी की समझ एक बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

इस बात को हवा में उड़ाते हुए शायद आप कहें, “अरे! हम तो छोटी कक्षाओं को पढ़ाते हैं वहाँ ऐसी बड़ी-बड़ी बातों के लिए कोई जगह नहीं है। हमारे स्कूल में आने वाले बच्चों की स्थिति शहर के बच्चों और विदेशी बच्चों से बहुत अलग है।”

आपकी बात सौ फीसदी सही है मगर आपके स्कूल में पढ़ने के लिए आने वाले छात्र-छात्राएँ बच्चे ही हैं इस बात से तो आप इनकार नहीं करेंगे न। अगर वे बच्चे हैं तो बच्चों की मानसिक बुनावट को समझना जरूरी है। उनके व्यवहार को समझना जरूरी है कि वे किस तरह से अपने परिवेश के साथ एक रिश्ता बनाते हैं। बच्चे आखिर किस तरह से किसी सवाल के समाधान के कैसे अलग-अलग तरीके से सोचते हैं। और सीखने के लिए विशिष्ट तरीका अपनाते हैं।

हर बच्चा अपने तरीके से सीखता है

कोई बच्चा बहुत से लोकप्रिय तरीके से सीखता है तो कोई बच्चा अपने विशिष्ट तरीके से किसी विषय को ग्रहण करता है और अपने तरीके से उस पर अपनी समझ का निर्माण करता है। इसी सन्‍दर्भ में बच्चों के मनोविज्ञान को समझने की जरूरत है। मनोविज्ञान को मानसिक प्रक्रियाओं, अनुभवों और व्यवहार के वैज्ञानिक अध्ययन के रूप में देखा जाता है। इसी नजरिये से शिक्षा मनोविज्ञान को भी क्लासरूम के व्यावहारिक परिदृश्य के सन्‍दर्भ में देखने की आवश्यकता है।

यहाँ गौर करने वाली बात है,  “स्कूल में बच्चों को पढ़ाते समय केवल कुछ बच्चों पर ध्यान देने से हम बच्चों का वास्तविक आकलन नहीं कर पाते कि वे क्या सीख रहे हैं? उनको किसी बात को समझने में कहाँ दिक्कत हो रही है? किस बच्चे को किस तरह की मदद की जरूरत है। किस बच्चे की क्या खूबी है। किस बच्चे की प्रगति सही दिशा में हो रही है। कौन सा बच्चा लगातार बेहतर प्रदर्शन कर रहा है और उसे आगे बढ़ने के लिए स्वतंत्र रूप से पढ़ने और काम करने के ज़्यादा मौके देने की जरूरत है।”

बतौर शिक्षक क्लासरूम में हमारा सभी बच्चों से संवाद हो और हम आखि‍री बच्चे तक पहुँच सकें यह सुनिश्चित करना चाहिए। इस बारे में एक नीति का विशेषतौर पर उल्लेख किया जाता है कि कोई भी बच्चा छूटे नहीं। अगर हम प्राथमिक शिक्षा पर ध्यान केन्द्रित करें तो पहली कक्षा में पढ़ने वाले कम उम्र के बच्चों (अंडर एज) के सीखने की रफ्तार बाकी बच्चों की तुलना में फर्क होती है मगर उसका पहली कक्षा में नामांकन उस बच्चे के भविष्य को अँधेरे में धकेले देगा। मगर यह बात उसी शिक्षक को समझ आएगी जो उस बच्चे के व्यवहार को समझने की कोशिश करेगा।

बच्चों को बच्चा समझें

अगर बच्चों को पढ़ाते समय उनको डाँटते हैं तो स्कूल में आने वाले नए बच्चों पर क्या असर पड़ता है? वे अपने बड़े भाई-बहन के पास क्यों बैठते हैं? मिसाल के तौर पर स्कूल आने वाली एक छोटी लड़की जिसका उच्चारण बहुत साफ है, जिसकी आवाज बहुत मीठी है जो अभी स्कूल के माहौल से परिचित हो रही है। स्कूल नाम की संस्था में ढलने की कोशिश कर रही है, अगर उसको न सीखने के लिए डाँटा जाता है, उसके ऊपर गुस्सा किया जाता है और वह रोती है तो इसके लिए शिक्षक की बच्चों को बच्चा न समझने वाली परिस्थिति ही ज्‍यादा जिम्मेदार है।

किसी कम उम्र के बच्चे को हम न सीखने के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया सकते। एक शिक्षक को बच्चों के आँसू और बच्चों की खुशी दोनों के लिए सोचना चाहिए।

क्यों गिरता है अधिगम स्तर?

अगर कोई शिक्षक कक्षा के कुछ बच्चों पर ही ध्यान देते हैं तो ऐसी स्थिति में क्या होता है? सारे बच्चों की जिम्मेदारी से आप मुक्ति पा लेते हैं और आपका पूरा ध्यान केवल ‘खास बच्चों पर केन्द्रित हो जाता है। ऐसे में आप कक्षा की सफलता को उन दो बच्चों की सफलता का पर्याय मान लेते हैं, जिसका परिणाम क्लासरूम में बैठने वाले बाकी बच्चों की उपेक्षा के रूप में सामने आता है।

इसका असर पूरी कक्षा के लर्निंग लेवल या अधिगम स्तर पर भी पड़ता है। इसके कारण ‘खास बच्चों’ (तीन-चार बच्चों) के सीखने का ग्राफ तो ऊपर बढ़ता है लेकिन अन्य बच्चों के सीखने का ग्राफ तेजी से नीचे गिरता है, जिसके कारण पूरी कक्षा का औसत प्रदर्शन सामान्य से बहुत नीचे चला जाता है।

अपने प्रोफेशन के प्रति समर्पित शिक्षक को ऐसी स्थिति संतुष्टि और खुशी नहीं दे सकती क्योंकि उसे यह बात महसूस होगी कि मैंने सभी बच्चों के साथ समान व्यवहार नहीं किया है।

पूर्वाग्रहों से बचना जरूरी

इसके साथ ही बच्चों के बारे में पूर्वाग्रहों का सवाल भी सामने आता है। अगर हम बच्चों के बारे में राय बना लेते हैं कि ये बच्चे तो जंगली हैं। आदिवासी हैं। गाँव के बच्चे हैं। इनके घर वालों की इनकी कोई पड़ी नहीं है। इनको भी घर जाने के बाद पढ़ाई से कोई मतलब नहीं होता। ये पढ़ना नहीं सीख सकते। इनको सिखाने के लिए मेहनत करना बेकार है तो ऐसी सोच का असर कभी-कभी काम के जज्बे और तरीके को भी प्रभावित करता है। ऐसे में इस तरह के विचारों से आजाद होकर काम करना और बच्चों के बारे में खुद का नए तरह का नजरिया बनने के लिए अनुभवों की खिड़की को खुला रखना मददगार होता है।

खुद भी सीखते रहें

बतौर शिक्षक आप बच्चों के पठन कौशन, समझ निर्माण व जीवन के प्रति एक व्यापक दृष्टिकोण का निर्माण कर रहे होते हैं। अपने व्यवहार से बच्चों की जिंदगी में एक छाप छोड़ रहे होते हैं। ऐसे में हमें खुद को वक्‍त के साथ अपडेट करने की जरूरत होती है। इसके लिए निरन्‍तर पढ़ना, लोगों से संवाद करना, शिक्षा के क्षेत्र में होने वाले भावी बदलावों को समझना बेहद जरूरी है। ताकि आप समय के साथ कदमताल करते हुए चल सकें और भावी नागरिकों के निर्माण का काम ज्यादा जिम्मेदारी और सक्रियता के साथ कर सकें। इस बारे में संक्षेप में कह सकते हैं कि बतौर शिक्षक हमें खुद भी लगातार सीखने का प्रयास जारी रखना चाहिए।
~वृजेश सिंह के ब्‍लाग एजूकेशन मिरर से साभार।

साल में 52 शनिवार और 52 रविवार : उत्तर प्रदेश में छुट्टियों पर सियासत, साल में छह महीने अवकाश

साल में 52 शनिवार और 52 रविवार : उत्तर प्रदेश में छुट्टियों पर सियासत, साल में छह महीने अवकाश

लखनऊ। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव द्वारा पटेल जयंती और आचार्य नरेन्द्र देव जयंती को सरकारी अवकाश घोषित करने के साथ ही अब छुट्टियों की संख्या 33 से बढकर 40 हो गई है।

साल के 365 दिनों में अगर 170 छुट्टियां हैं तो समझ लीजिए कर्मचारियों और अधकारियों को छ: महीने काम ही नहीं करने पड़ेगा। इसका असर सरकारी कामकाज पर जरुर पड़ेगा। सचिवालय और पांच दिनी कार्यालयों में सरकारी कामकाज का कुछ ऐसा ही हाल है। जो कर्मचारी 30 दिन का उपार्जित अवकाश भी ले लें, वे छह महीने से भी अधिक छुट्टी का लुत्फ उठा सकते हैं।

साल में 52 शनिवार और 52 रविवार होते हैं. इसके अलावा सरकारी कर्मचारियों को सीएल, पीएल, सिक लीव और 30 दिन का उपार्जित अवकाश भी मिलता है. ऐसी स्थिति में छुट्टियों की सख्या 170 तक पहुंच जाती है।

सपा सरकार ने देश के पहले उपप्रधानमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल व आचार्य नरेंद्रदेव की जयंती पर साल का छठा नया सार्वजनिक अवकाश घोषित कर छुट्टियों की सियासत को चर्चा का विषय बना दिया है.

यूपी में साल के 365 में से 170 दिन छुट्टियां

वैसे भी सरकारी कामकाज कैसे होते हैं और किस रफ़्तार से होते हैं यह किसी से छुपा नहीं है। ऐसे में अगर छ: महीने छुट्टियां हो तो फिर जनता को परेशान तो होना ही पड़ेगा। लेकिन सरकार को क्या वह तो अवकाश पर भी सियासत करने से नहीं चूक रही।

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बीटीसी प्रशिक्षण 2013, सेवारत बीटीसी (मृतक आश्रित), उर्दू बीटीसी द्विवर्षीय पाठ्यक्रम परीक्षा वर्ष 2015 दूसरे सेमेस्टर का परीक्षाफल घोषित : क्लिक कर रिजल्ट डाउनलोड कर देखें |

बीटीसी प्रशिक्षण 2013, सेवारत बीटीसी (मृतक आश्रित), उर्दू बीटीसी द्विवर्षीय पाठ्यक्रम परीक्षा वर्ष 2015 दूसरे सेमेस्टर का परीक्षाफल घोषित : क्लिक कर रिजल्ट डाउनलोड कर देखें |

मृतक आश्रित का रिजल्ट यहां क्लिक कर डाउनलोड करें |

बीटीसी प्रशिक्षण बैच 2013 पार्ट -1द्वितीय सेमेस्टर का परीक्षा परिणाम यहां क्लिक कर डाउनलोड करें |

बीटीसी प्रशिक्षण बैच 2013 पार्ट -2 द्वितीय सेमेस्टर का परीक्षा परिणाम यहां क्लिक कर डाउनलोड करें |

लोचा-शिक्षामित्र नियमित सरकारी शिक्षक नहीं बन सकते : क्लिक कर यूनेस्को की समीक्षा रिपोर्ट देखें और डाउनलोड करें |

लोचा-शिक्षामित्र नियमित सरकारी शिक्षक नहीं बन सकते : क्लिक कर यूनेस्को की समीक्षा रिपोर्ट देखें और डाउनलोड करें |

शिक्षामित्रों को नियमित करने की अनुमति यूनेस्को भी नहीं देता | यह बात जानकर शिक्षामित्रों को बेहद दु:ख होगा । आप में से बहुत से शिक्षामित्र साथी और नेतागण इसे ग़लत साबित करने की कोशिश करेंगे और अन्यथा भी ले सकते पर प्रस्तुत पर गौर करें, लेकिन मैं पहले ही यह स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि यह मेरा व्यक्तिगत मत नहीं है।

"बेसिक शिक्षा न्यूज़ | आज का प्राइमरी का मास्टर" पर सिर्फ़ यूनेस्को की रिपोर्ट साझा की जा रही है। कृपया इस केस से सम्बंधित सभी लोग इस पर एक नज़र जरूर डालें और सम्भव हल हो निकालने का प्रयास करें |

~यूनेस्कों की समीक्षा रिपोर्ट डाउनलोड करने के लिए यहां क्लिक करें |

Para Teachers in India : A Review - Unesco

भारत में पैरा टीचर्स : एक समीक्षा - यूनेस्को

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शासन छात्रों के नामांकन में अनियमितता पर गंभीर : कम उपस्थिति पर शासन ने किया गंभीर रुख अख्तियार

शासन छात्रों के नामांकन में अनियमितता पर गंभीर : कम उपस्थिति पर शासन ने किया गंभीर रुख अख्तियार

लखनऊ : परिषदीय स्कूलों में छात्रों के पंजीकरण को बढ़ा-चढ़ाकर दर्शाने और विद्यालयों में बच्चों की कम उपस्थिति पर शासन ने गंभीर रुख अख्तियार किया है। शासन ने सभी जिलाधिकारियों को अभियान चलाकर परिषदीय विद्यालयों का सघन निरीक्षण कराने का निर्देश दिया है ताकि ऐसी अनियमितताओं पर अंकुश लगाया जा सके। 

परिषदीय स्कूलों में छात्र-छात्रओं का एक से अधिक स्कूलों में नामांकन की शिकायतें शासन को मिल रही हैं। परिषदीय विद्यालयों में छात्रों का नामांकन बढ़ा-चढ़ाकर दर्शाया जा रहा है। वहीं परिषदीय विद्यालयों में बच्चों को मुफ्त में बांटी जाने वाली किताबों, यूनिफॉर्म और मिड-डे मील के लिए धनराशि का आवंटन स्कूलों में बच्चों के नामांकन की संख्या के आधार पर किया जाता है। शिकायतें मिलती हैं कि कागज पर दिखाए गए छात्रों के नामांकन के आधार पर किताबों, यूनिफॉर्म और मिड-डे मील के लिए मिलने वाली धनराशि की बंदरबांट हो जाती है।

लिहाजा मुख्य सचिव ने सभी जिलाधिकारियों को आदेश जारी करते हुए अभियान चलाकर स्कूलों का सघन निरीक्षण करने के लिए कहा है। मुख्य सचिव ने इस सिलसिले में की गई कार्यवाही की सूचना 15 दिसंबर तक शासन/राज्य परियोजना निदेशक सर्व शिक्षा अभियान/ निदेशक बेसिक शिक्षा/ निदेशक मध्याह्न् भोजन प्राधिकरण को उपलब्ध कराने का भी निर्देश दिया है।

नियुक्ति का पेंच : 'खराब मुद्रा अच्छी मुद्रा को चलन से बाहर कर देती है’ अर्थशास्त्र में ग्रेशम का यह सिद्धांत शिक्षामित्रों पर बिल्कुल सटीक बैठता है, अयोग्य की भीड़ में पिस गए योग्य |

नियुक्ति का पेंच : 'खराब मुद्रा अच्छी मुद्रा को चलन से बाहर कर देती है’ अर्थशास्त्र में ग्रेशम का यह सिद्धांत शिक्षामित्रों पर बिल्कुल सटीक बैठता है, अयोग्य की भीड़ में पिस गए योग्य |

इलाहाबाद : 'खराब मुद्रा अच्छी मुद्रा को चलन से बाहर कर देती है’ अर्थशास्त्र में ग्रेशम का
यह सिद्धांत शिक्षामित्रों पर बिल्कुल सटीक बैठता है। शिक्षामित्रों के समायोजन में जिन युवाओं में शिक्षक बनने की न्यूनतम अर्हता भी नहीं थी, उन पर अंगुली उठी, लेकिन उन युवाओं का भी समायोजन अवैध हो गया, जो सारी अर्हताएं पूरी करते थे। वजह आला अफसरों की अनदेखी है। नियुक्ति की गलत प्रक्रिया शुरू होने एवं आरक्षण के नियमों का अनुपालन न होने से करीब पौने दो लाख शिक्षामित्र शिक्षक बनने की दौड़ से बाहर हो गए हैं।


बेसिक शिक्षा परिषद के प्राथमिक स्कूलों में डेढ़ दशक पहले शिक्षामित्रों की तैनाती हुई थी। हर विद्यालय में दो-दो शिक्षामित्र रखे जाने से उनकी
संख्या एक लाख 96 हजार तक पहुंच गई थी। 1999 में शासन ने निर्देश जारी किया, जो शिक्षामित्र बीएड पास होंगे उन्हें वरीयता दी जाएगी। इससे बीएड पास अभ्यर्थियों की शिक्षामित्र के रूप में तैनाती हुई, वहीं 10अक्टूबर 2005 को आदेश हुआ कि अनौपचारिक शिक्षा में कार्य करने वालों को नियुक्ति में वरीयता मिलेगी। इससे अनौपचारिक शिक्षा में कार्य करने वाले शिक्षामित्र बने।


15 जून 2007 को शासनादेश हुआ कि जो शिक्षामित्र स्नातक हैं उन्हें बीटीसी की दस फीसदी एवं जो बीएड हैं उनका विशिष्ट बीटीसी की दस फीसद सीटों पर चयन किया जाएगा। ऐसे में करीब 16 हजार शिक्षामित्र विशिष्ट बीटीसी करके एवं छह हजार बीटीसी करके नियमित शिक्षक पहले ही बन चुके हैं। इसके बाद भी विभाग में स्नातक, बीएड करके शिक्षामित्र बनने वालों की भरमार रही।


2010 एवं 2011 सामान्य बीटीसी की दस फीसदी सीटों पर शिक्षामित्रों का चयन हुआ था। दूरस्थ बीटीसी करने वाले शिक्षामित्रों की तादाद तो काफी अधिक है उनमें से बड़ी संख्या में युवाओं ने टीईटी भी पास किया है। करीब तीस फीसद साथी टीईटी भी पास हैं। इसकी वजह यह है कि 2011 में एनसीटीई के फरमान पर जब टीईटी अनिवार्य हुआ तो युवाओं ने उस परीक्षा में भी बैठना और उसे उत्तीर्ण करना शुरू किया। इस सारी कवायद पर उस समय
पानी फिर गया, जब इंटर उत्तीर्ण युवाओं को शिक्षामित्रों बनाने पर अंगुली उठी। 1कहा गया कि शिक्षक बनने की न्यूनतम अर्हता स्नातक है तो इंटर उत्तीर्ण युवाओं को शिक्षक कैसे बनाया जाएगा।


यह प्रकरण हाईकोर्ट में जाने पर नियुक्ति अधिकारी पर सवाल उठे। कहा गया कि शिक्षकों की नियुक्ति बेसिक शिक्षा अधिकारी करता है आखिर ग्राम प्रधान की नियुक्ति कैसे मानी जा सकती है। ऐसे ही शिक्षामित्रों की नियुक्ति में आरक्षण के नियमों की भी अनदेखी हुई। लिहाजा सारे शिक्षामित्रों का हाईकोर्ट ने समायोजन अवैध घोषित कर दिया। अफसर यह भी मानते हैं कि कई शिक्षामित्र अर्हता रखते हैं, लेकिन उन्हें नियमित शिक्षक के रूप में इसलिए
मौका नहीं दिया जा सकता, क्योंकि उनकी नियुक्ति ही सही तरीके से नहीं की गई है।



Dayanand Tripathi

शिक्षामित्र मामले में सुप्रीम कोर्ट में दोहरी दस्तक : बेसिक शिक्षा परिषद ने शीर्ष अदालत में दाखिल की एसएलपी, सुप्रीम कोर्ट में शासन की ओर से एसएलपी अगले हफ्ते

शिक्षामित्र मामले में सुप्रीम कोर्ट में दोहरी दस्तक : बेसिक शिक्षा परिषद ने शीर्ष अदालत में दाखिल की एसएलपी, सुप्रीम कोर्ट में शासन की ओर से एसएलपी अगले हफ्ते

√बेसिक शिक्षा परिषद ने शीर्ष अदालत में दाखिल की एसएलपी

√सुप्रीम कोर्ट में शासन की ओर से एसएलपी अगले हफ्ते

लखनऊ : शिक्षामित्रों को पक्की नौकरी देने के बाद हाई कोर्ट में दांव खाने वाली राज्य सरकार इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में सुप्रीम कोर्ट में दोहरी दस्तक देगी। बेसिक शिक्षा परिषद ने शीर्ष अदालत में विशेष अनुज्ञा याचिका (एसएलपी) दाखिल करते हुए इसकी शुरुआत कर दी है। वहीं शासन की ओर से अगले हफ्ते सुप्रीम कोर्ट में एसएलपी दाखिल करने की तैयारी है।

शिक्षामित्रों के समायोजन को अवैध ठहराकर हाई कोर्ट ने सरकार को करारा झटका दिया है। लिहाजा सरकार हाई कोर्ट के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ना चाहती। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में दो एसएलपी दाखिल करने की योजना बनायी गई है जिस पर अमल शुरू हो गया है। परिषदीय विद्यालय बेसिक शिक्षा परिषद द्वारा संचालित होते हैं। परिषदीय स्कूलों के शिक्षक बेसिक शिक्षा परिषद के अधीन होते हैं। लिहाजा इस मामले में बेसिक शिक्षा परिषद की ओर से सुप्रीम कोर्ट में एसएलपी दाखिल कर दी गई है। वहीं शासन की ओर भी सुप्रीम कोर्ट में एडवोकेट आन रिकॉर्ड शमशाद अहमद के माध्यम से एसएलपी दाखिल करने की तैयारी है।

मुख्य सचिव आलोक रंजन ने शुक्रवार को बेसिक शिक्षा विभाग के अधिकारियों के साथ बैठक करके शासन की ओर दाखिल की जाने वाली एसएलपी के बारे में विचार विमर्श किया। उन्होंने प्रमुख सचिव डिंपल वर्मा को जल्द ही सुप्रीम कोर्ट में एसएलपी दाखिल करने का निर्देश दिया। माना जा रहा है कि अगले हफ्ते सुप्रीम कोर्ट में शासन की ओर से एसएलपी दाखिल कर दी जाएगी।

सीटीईटी की अगली परीक्षा 21 फरवरी और 18 सितंबर को : सीबीएसई की ओर से यह परीक्षा साल में दो बार की जाती है आयोजित ।

सीटीईटी की अगली परीक्षा 21 फरवरी और 18 सितंबर को : सीबीएसई की ओर से यह परीक्षा साल में दो बार की जाती है आयोजित ।

सीबीएसई ने अगले साल होने वाले सीटीईटी की परीक्षा तिथि भी घोषित कर दी हैं। सीबीएसई की ओर से यह परीक्षा साल में दो बार आयोजित की जाती है। सीटीईटी का नौवां संस्करण 21 फरवरी और दसवां संस्करण 18 सितंबर 2016 को आयोजित किया जाएगा।

छुट्टियों की सियासत सरकारी कामकाज पर भारी : साल के 365 में से 156 दिन छुट्टियों के नाम, उपार्जित अवकाश लें तो साल में छह महीने की ही नौकरी

छुट्टियों की सियासत सरकारी कामकाज पर भारी : साल के 365 में से 156 दिन छुट्टियों के नाम, उपार्जित अवकाश लें तो साल में छह महीने की ही नौकरी

√बढ़ती जा रही हैं सरकार से जनता की शिकायते

√उपार्जित अवकाश लें तो साल में छह महीने की ही नौकरी

लखनऊ। साल में औसतन 52 शनिवार और 52 रविवार। 36 दिन राजपत्रित सार्वजनिक अवकाश। साल में दो निर्बंधित अवकाश। कर्मचारियों का 14 दिनों का आकस्मिक छुट्टी का अधिकार। यानी साल के 365 दिनों मेें 156दिन की छुट्टी। सचिवालय और पांच दिनी कार्यालयों में सरकारी कामकाज का कुछ ऐसा ही हाल है। जो कर्मचारी 30 दिन का उपार्जित अवकाश भी ले लें, वे छह महीने से भी अधिक छुट्टी का लुत्फ उठा सकते हैं।

सूबे में छुट्टियों की सियासत कोई नई नहीं है, पर बसपा और सपा सरकारों ने इसे कुछ ज्यादा ही भुनाने की कोशिश की। सपा सरकार ने देश के पहले उपप्रधानमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल व आचार्य नरेंद्रदेव की जयंती पर साल का छठा नया सार्वजनिक अवकाश घोषित कर छुट्टियों की सियासत को चर्चा का विषय बना दिया है

जानकार बताते हैं कि कर्मचारी अधिकतम 300 दिन ही उपार्जित अवकाश रख सकते हैं। 10 से 15 साल की सेवा में कर्मचारियों का यह कोटा पूरा हो जाता है। इसके बाद उपार्जित अवकाश न ले पाने पर लैप्स हो जाते हैं। पहले अवकाश न लेने पर 30 दिन का नकद वेतन मिल जाता था, लेकिन बीच में यह व्यवस्था केंद्र ने खत्म कर दी तो प्रदेश में भी बंद हो गई। नतीजतन तमाम
कर्मचारी उपार्जित अवकाश लैप्स होने के बजाय हर छह महीने पर किसी न किसी बहाने ये छुट्टियां ले ही लेते हैं।

यानी ऐसे कर्मचारियों की संख्या काफी होती है जो 10-15 साल की नौकरी के बाद साल के 365 दिनों में से 180 दिनों से ज्यादा की छुट्टियां पाने का हक रखते हैं। सरकारी कामकाज में सुस्ती और जनता की बढ़ती शिकायतों के लिए छुट्टियों की सियासत कम जिम्मेदार नहीं मानी जाती। वजह, छुट्टियों का सीधा असर सरकारी कामकाज पर पड़ता है। वहीं, सरकार यदि छुट्टी के दिनों में किसी खास कारण से कर्मचारियों को अतिरिक्त काम के लिए बुलाती है तो उन्हें अतिरिक्त मानदेय देना पड़ता है।

शासन के एक वरिष्ठ अधिकारी कहते हैं कि बढ़ती छुट्टियों में कार्मिकों की कोई भूमिका नहीं है, लेकिन जब सरकार छुट्टियां के बहाने सियासत साध सकती है तो फिर कर्मचारी अपने हक की छुट्टियों का उपभोग क्यों न करें ?

इन 5 तरह के लोगों को Facebook पर कभी न बनाएं दोस्त : कुछ ऐसे दोस्त हैं जिन्हें शायद आपको गुडबाय कह देना चाहिए

इन 5 तरह के लोगों को Facebook पर कभी न बनाएं दोस्त : कुछ ऐसे दोस्त हैं जिन्हें शायद आपको गुडबाय कह देना चाहिए 

फेसबुक अब ऐसा माध्यम बन चुका है जिससे लोग आपस मेंजुड़े रहते हैं|दोस्त हो या परिवार के सदस्य, फेसबुक अबलगभग हर कोई यूज करता है, पर इसका मतलब ये भी है कीअच्छा हो या बुरा हर कोई इस सोशल साइट पर उपलब्ध है।यहां हम आपको ऐसे10 लोगों के बारे में बताने जा रहे हैं जोहम सबकी फ्रेंड लिस्ट में होंगे पर इनसे छुटकारा पाने के बारे मेंहमें जरूर सोचना चाहिए :

Attention Seeker

1. फेसबुक पर हर किसी की फ्रेंड लिस्ट में एक न एक ऐसा दोस्ततो जरूर होगा जो सभी का अटेंशन अपनी ओर खींचना चाहताहै| ऐसे लोग अपने फेसबुक स्टेटस में ऐसी अपडेट करेंगे जिससेसभी लोग उनसे प्रश्न करें, जैसे: " यह आखिरी बार था जब मैंनेकिसी लड़के पर विश्वास किया" अब पूछने वाले पूछते रहेंगे की 'क्या हुआ?' पर ऐसे लोग जवाब देने के बजाय अपनी पोस्ट कोपढ़कर खुश होते रहेंगे|

School Trick

2. आपको फेसबुक पर मैसेज और फ्रेंड रिक्वेस्ट एक साथ आतीहै, " कैसे हो तुम? हम एक ही स्कूल से हैं,तुम्हे याद तो है?" औरआप पलटकर जवाब देते हैं की 'हां, याद है', पर असल में आपउस इंसान को जानते ही नहीं और एक फ्रेंड रिक्वेस्ट आपकोसोचने पर मजबूर कर देती है की आप इस इंसान से कहां मिले|आप उससे आगे भी बात करते रहते हैं, जबकि आपको ठीक सेकुछ भी याद नहीं की वो है कौन?

Quoteholic

3. कुछ ऐसे भी दोस्त होते हैं जो न जाने किस-किस विषय परदुनिया भर की पोस्ट करते रहते हैं और आपकी फेसबुक वॉलउनकी इन्ही कोट्स से भर जाती है| आप कहना तो चाहते हैं की 'आप अपनी जिंदगी में हर पल क्या कर रहे हैं और उसके बारे मेंक्या सोचते हैं, इससे मुझे कुछ लेना-देना नहीं', पर कह नहीं पातेऔर आपकी वॉल अभी भी उन पोस्ट्स से भरी है|

Over Sharer

4. इस तरह के दोस्त तो हम सभी की फ्रेंड लिस्ट में होंगे| ऐसेलोग जो जरूरत से ज्यादा शेयर करते हैं| अब भगवान जाने वोऐसा क्यों सोचते हैं की वो रोज क्या कर रहे है और उनकी एक-एक मिनट की डिटेल में हमें किसी भी तरह की रूचि है|

Left-over

5. इन सभी तरह के लोगों के अलावा कुछ ऐसे दोस्त भी होते हैंजिनके साथ हमारी मीठी यादें होती है, पर अब उस दोस्ती मेंसिर्फ यादें ही बची होती हैं| ऐसे लोगों को अपनी जिंदगी से जानेदेना मुश्किल होता है, पर उन्ही लोगों को जिंदगी में आगे बढ़तेदेखना, उनकी पोस्ट्स देखना आपको दुःख देता है|

तो यह कुछ ऐसे दोस्त हैं, जिन्हे शायद आपको गुडबाय कह देना चाहिए|

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सीटीईटी में 17.48 फीसद अभ्यर्थी उत्तीर्ण : हालांकि, सीटीईटी पास करने का मतलब किसी व्यक्ति की नियुक्ति या रोजगार से नहीं

सीटीईटी के नतीजे घोषित : पेपर-1 व पेपर-2 में कुल 1,14,580 ने किया क्वालिफाई

नई दिल्ली। केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड ने सेंट्रल टीचर एलिजिबिलिटी टेस्ट (सीटीईटी) के नतीजे जारी कर दिए हैं, जिनमें इस बार उछाल देखने को मिला है। फरवरी में हुई परीक्षा के नतीजों में जहां पास प्रतिशत महज 12.18 फीसदी था वहीं इस बार के नतीजों में यह बढ़कर 17.48 फीसदी हो गया है। नतीजे जारी करने के साथ ही बोर्ड ने अगले साल होने वाले सीटीईटी की परीक्षा तिथियां भी घोषित कर दी हैं।


सितंबर 2015 में आयोजित इस परीक्षा में देश भर से पेपर-1 और पेपर-2 के लिए 1,14,580 उम्मीदवारों ने क्वालिफाई किया है। इस तरह इसमें 60 फीसदी या इससे अधिक अंक प्राप्त करने वाले परीक्षार्थी उत्तीर्ण माने गए।


सीबीएसई की ओर से घोषित यह नतीजे www.cbse.nic.in, www.ctet.nic.in पर देखे जा सकते है। देश भर के 76 शहरों में 959 सेंटरों पर इस टेस्ट में पेपर-1 व पेपर-2 के लिए 6,55,660 उम्मीदवार परीक्षा में बैठे थे। मालूम हो कि सीबीएसई की ओर से इस परीक्षा के नतीजों में सुधार के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। बीते सालों में परीक्षा की समयावधि भी डेढ़ घंटे से बढ़ाकर ढाई घंटे कर दी गई है। उल्लेखनीय है कि परीक्षार्थियों की सुविधा के लिए ओएमआर शीट में भरे गए विकल्पों का जांच करने की सुविधा उपलब्ध कराई थी।

       साभार : अमरउजाला

सीटीईटी में 17.48 फीसद अभ्यर्थी उत्तीर्ण : हालांकि, सीटीईटी पास करने का मतलब किसी व्यक्ति की नियुक्ति या रोजगार से नहीं

नई दिल्ली : सीबीएसई की ओर से देश के विभिन्न परीक्षा केंद्रों पर आयोजित किए गए सेंट्रल टीचर एलिजिबिलिटी टेस्ट-2015 (सीटीईटी) का परिणाम शुक्रवार को घोषित कर दिया गया। सितंबर माह में हुए टेस्ट में कुल 17.48 फीसद अभ्यर्थी पास हुए हैं।

इस बार परीक्षा में कुल 6,55660 अभ्यर्थियों ने हिस्सा लिया था, जिसमें कुल 1,14,580 उत्तीर्ण हुए। सीटीईटी 2015 के परीक्षा पत्र की उत्तर पुस्तिका (आंसर की) पहले ही (21 अक्टूबर 2015 को) वेबसाइट पर जारी की जा चुकी है। 60 फीसद या अधिक अंक हासिल करने वालों को पात्रता प्रमाण पत्र दिया जाएगा। हालांकि, सीटीईटी पास करने का मतलब किसी व्यक्ति की नियुक्ति या रोजगार से नहीं है।

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जिलों में ही निपटाएं 15 हजार शिक्षक भर्ती की समस्याएं : बेसिक शिक्षा परिषद के सचिव संजय सिन्हा ने सभी बेसिक शिक्षा अधिकारियों को निर्देश भेज दिए

जिलों में ही निपटाएं 15 हजार शिक्षक भर्ती की समस्याएं : बेसिक शिक्षा परिषद के सचिव संजय सिन्हा ने सभी बेसिक शिक्षा अधिकारियों को निर्देश भेज दिए

राज्य मुख्यालय । प्रदेश में चल रही 15000 शिक्षकों की भर्ती में आ रही समस्याओं का हल जिले में ही किया जाएगा। इस संबंध में बेसिक शिक्षा परिषद के सचिव संजय सिन्हा ने सभी बेसिक शिक्षा अधिकारियों को निर्देश भेज दिए हैं। उन्होंने कहा है कि किसी भी समस्या के लिए अभ्यर्थी को परिषद के इलाहाबाद कार्यालय न भेजा जाए। 

इस भर्ती में पहली काउंसिलिंग 26 अक्टूबर से शुरू हुई है। अभ्यर्थी ऑनलाइन आवेदन में हुई गलतियों या फिर अन्य समस्याओं के लिए जब जिले के शिकायत प्रकोष्ठ में शिकायत कर रहे हैं तो उनका हल करने के बजाय जिले के अधिकारी उन्हें इलाहाबाद कार्यालय में भेज देते हैं। इससे परिषद के काम में रुकावट तो आ ही रही है, साथ ही अभ्यर्थियों को भी परेशानी हो रही है। ऐसे अभ्यर्थियों की परेशानी का निवारण जिले में ही किया जाए और उन्हें परिषद में न भेजा जाए। 

पास के जिले में कराएं काउंसिलिंग-साथ ही, जिन  जिलों में डायट नहीं है उन्हें पास के जिले में काउंसिलिंग कराने के निर्देश दिए गए हैं। ऐसे कई जिले हैं जहां डायट नहीं है। यहां की सीटें उनके पास के किसी जिले में आवंटित की गई हैं।

मसलन शामली या संभल जैसे नए जिलों में डायट नहीं है, वहां की सीटें क्रमश: मुजफ्फरनगर व मुरादाबाद में है लिहाजा इन जिलों का नाम आवेदन पत्र में भरने वाले अभ्यर्थियों की काउंसिलिंग मूल जिलों में होंगी। अभी ऐसे अभ्यर्थियों को वापस किया जा रहा है जिन्होंने शामली, संभल या संत कबीर नगर जैसे जिलों का नाम भरा है, जहां डायट नहीं है।

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