Thursday, September 12, 2019

MAN KI BAAT : सरकारी स्कूलों में छात्रों के सीखने का स्तर उन तथाकथित ‘स्मार्ट निजी स्कूलों’ से कमतर नहीं हैं, जो मुख्यत: ‘व्यावसायिक हित’ के लिए कुकुरमुत्ते की तरह उग आए और आप यह भी समझ लें कि ऐसा नहीं है कि हमारे स्कूलों ने हमें फेल कर दिया, बल्कि राजनीतिक और नौकरशाही व्यवस्था ने हमारे स्कूलों को फेल कर....

MAN KI BAAT : सरकारी स्कूलों में छात्रों के सीखने का स्तर उन तथाकथित ‘स्मार्ट निजी स्कूलों’ से कमतर नहीं हैं, जो मुख्यत: ‘व्यावसायिक हित’ के लिए कुकुरमुत्ते की तरह उग आए और आप यह भी समझ लें कि ऐसा नहीं है कि हमारे स्कूलों ने हमें फेल कर दिया, बल्कि राजनीतिक और नौकरशाही व्यवस्था ने हमारे स्कूलों को फेल कर....

🔵 अनदेखी रह जाती हैं सरकारी स्कूलों की उपलब्धियां

कुछ  वर्ष पहले मुझे एक सरकारी अस्पताल में जाना पड़ा, क्योंकि मेरा बेटा एक दुर्घटना में घायल हो गया था और पुलिस ने एफआईआर दर्ज करने के लिए उसे बेंगलुरु के एक सरकारी अस्पताल में भेज दिया। वहां कोई भी प्रशिक्षित डॉक्टर ड्यूटी पर नहीं था। गंदगी और कचरा हर तरफ फैला हुआ था। ड्यूटी पर तैनात प्रशिक्षु डॉक्टर ने बाहर दुकान से पट्टी और टांके लगाने के लिए धागा लाने को कहा, क्योंकि ये दोनों चीजें वहां उपलब्ध नहीं थीं। इस बीच डॉक्टर ने एक गंदी टे्र और पुराने धागे से मेरे बेटे के निचले होंठ में टांके लगाने की तैयारी कर ली। पर मेरे बेटे ने टांके लगवाने से इनकार कर दिया। मैं कई सरकारी दफ्तरों की ऐसी अव्यवस्थाएं देख चुका हूं। वहां नागरिकों को वे बुनियादी सेवाएं भी नहीं मिलतीं, जिनकी उनसे उम्मीद की जाती है। 

इसकी तुलना एक औसत सरकारी स्कूल से करें। चाहें, तो देश के दूरस्थ इलाकों में मौजूद कुछ सरकारी स्कूलों से भी इसकी तुलना कर सकते हैं। 98 प्रतिशत से अधिक हमारे गांवों में जो स्कूल भवन है- वह उस गांव के बेहतर भवनों में से एक है। ज्यादातर स्कूलों का अच्छी तरह रंग-रोगन हुआ है और उनमें सबसे ऊपर लेटी हुई एक खुशनुमा पेंसिल बनाई गई है। ज्यादातर स्कूलों में खेल का एक मैदान है, पीने के पानी की व्यवस्था है, लड़के-लड़कियों के लिए अलग-अलग शौचालय हैं, विज्ञान किट है, खेल के सामान हैं और संगीत के साज भी। लगभग सभी स्कूलों में बच्चों के लिए प्रतिदिन ताजा पकाया हुआ अच्छा खाना दिया जाता है। स्कूल इतने उदार हैं कि वे मध्याह्न भोजन के लिए छात्रों के छोटे भाई-बहनों को लाने की अनुमति भी दे देते हैं। 

सरकारी स्कूलों के खिलाफ सबसे अधिक लगाए जाने वाले आरोप हैं- शिक्षक स्कूल नहीं आते या पढ़ाते नहीं, सरकारी स्कूलों के बच्चे सीखते नहीं, सरकार सार्वजनिक शिक्षा पर बहुत कम धन खर्च करती है। मगर जमीनी स्तर पर सच्चाई कुछ और है। 80 प्रतिशत से भी अधिक स्कूलों में कम से कम दो शिक्षक नियमित रूप से स्कूल आते हैं और बच्चों के साथ कुछ सार्थक काम करने का प्रयास करते हैं। बहुत से शिक्षक खराब सार्वजनिक परिवहन के बावजूद स्कूल आने के लिए हर रोज अनेक किलोमीटर की यात्रा करते हैं। सरकारी स्कूलों के लोग आमतौर पर वहां आने वालों का स्वागत करते हैं। पिछले 15 साल में किए गए शोध बार-बार यह तथ्य सामने लाते रहे हैं कि सरकारी स्कूलों में छात्रों के सीखने का स्तर उन तथाकथित ‘स्मार्ट निजी स्कूलों’ से कमतर नहीं हैं, जो मुख्यत: ‘व्यावसायिक हित’ के लिए कुकुरमुत्ते की तरह उग आए हैं। इस बात के पर्याप्त प्रमाण हैं कि औसत सरकारी स्कूल में सीखने का स्तर औसत निजी स्कूल से थोड़ा बेहतर ही होता है, जबकि इनमें ज्यादातर ऐसे बच्चे होते हैं, जो सामाजिक-आर्थिक रूप से सबसे वंचित परिवारों से आते हैं। सरकारी स्कूलों में हर बच्चे पर होने वाला खर्च निजी स्कूलों में होने वाले खर्च का अंश मात्र होता है। ऐसी स्थितियों में सरकारी स्कूल हर बच्चे में जो ‘मूल्य’ जोड़ते हैं, वह उन स्कूलों से उल्लेखनीय रूप से उच्चतर होता है, जहां ‘अच्छे घरों’ के बच्चे पढ़ते हैं। समाज अक्सर इस ‘समाहित मूल्य’ की उपेक्षा करता है। जैसे ही माता-पिता कुछ फीस भरने लायक हो जाते हैं, तो वे पहला काम अपने बच्चे का प्रवेश किसी निजी स्कूल में करवाने का करते हैं। 

बेशक, सरकारी स्कूलों की असफलता के कई कारण हैं। आजादी के बाद जिन राजनेताओं ने देश पर शासन किया, उन्हें एक अच्छी शिक्षा के लिए राष्ट्रीय  नीति (1986) लाने में 39 साल लग गए। सर्वशिक्षा अभियान में 45 साल लग गए और हमारे स्कूलों के लिए आवश्यक गुणवत्तापूर्ण शिक्षा (राष्ट्रीय पाठ्यचर्या फ्रेमवर्क) को परिभाषित करने में 50 साल लग गए। हमारे नेतृत्व ने शिक्षा को टुकड़ों में देखा है, जिसने हमें बहुत अधिक नुकसान पहुंचाया है। सभी सरकारें जनता की एक विशाल आबादी को शिक्षित करने के लिए जरूरी बजट उपलब्ध कराने में असफल रही हैं। ऐसा नहीं है कि हमारे स्कूलों ने हमें फेल कर दिया, बल्कि राजनीतिक और नौकरशाही व्यवस्था ने हमारे स्कूलों को फेल कर दिया है। 

  लेख- दिलीप रंजरेकर
(ये लेखक के अपने विचार हैं)
हिन्दुस्तान सम्पादकीय पृष्ठ से

Sunday, September 08, 2019

CIRCULAR, MEETING, MINISTER : मा0 बेसिक शिक्षा राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) की अध्यक्षता में 11 सितम्बर को प्रस्तावित बैठक के एजेण्डा बिंदु

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TRANSFER : बेसिक व माध्यमिक शिक्षा में अफसरों के तबादलों में खींची गई लकीर, विभाग खुद लेंगे तैनाती-तबादले पर निर्णय

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साभार : हिन्दुस्तान 

SCIENCE : सरकारी स्कूलों में विज्ञान की पढ़ाई का बुरा हाल, 8वीं तक के बच्चों के लिए प्रेक्टिकल की व्यवस्था नहीं

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साभार : हिन्दुस्तान

GAMES : परिषदीय स्कूलों के विद्यार्थी भी खेल सकेंगे नेशनल गेम, टीमों के बाहर जाने पर खर्च को लेकर संशय

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साभार : दैनिक जागरण

BED, FAKE : चिन्हित हुए फर्जी प्रशिक्षण से बनने वाले शिक्षक, 42 जिलों ने नही भेजा फर्जीवाड़े के अभ्यर्थियों का पता

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साभार : दैनिक जागरण


Friday, August 30, 2019

ALLAHABAD HIGHCOURT, SHIKSHAK BHARTI : 68500 सहायक अध्यापक भर्ती के अभ्यर्थियों को बड़ी राहत

ALLAHABAD HIGHCOURT, SHIKSHAK BHARTI : 68500 सहायक अध्यापक भर्ती के अभ्यर्थियों को बड़ी राहत


विधि संवाददाता, प्रयागराज : इलाहाबाद हाईकोर्ट ने प्रदेश के प्राथमिक स्कूलों में 68500 सहायक अध्यापक भर्ती में मेरिट पर सामान्य वर्ग में चयनित आरक्षित श्रेणी के (एमआरसी) अभ्यर्थियों को बड़ी राहत दी है। कोर्ट ने ऐसे अभ्यर्थियों को अगले शिक्षा सत्र 2020 -21 में उनकी वरीयता वाले जिलों में तैनात करने का निर्देश दिया है।

कोर्ट ने कहा कि वर्तमान सत्र में की गयी एमआरसी अभ्यर्थियों की तैनाती संविधान के अनुच्छेद 14 व 16 (1) के विपरीत है। कोर्ट ने मनमाने तरीके से तैनाती का आदेश रद कर दिया है। यह आदेश न्यायमूर्ति प्रकाश पाडिया ने एक हजार से अधिक याचिकाओं को निस्तारित करते हुए दिया है। कोर्ट ने कहा कि इस आदेश का लाभ एमआरसी (मेरिट में चुने गए आरक्षित श्रेणी के अभ्यर्थी) अभ्यर्थियों को ही मिलेगा। इन्हें आरक्षित श्रेणी में मानते हुए वरीयता वाले जिले में इनकी तैनाती की जाए। जो पहले से नियुक्त हो चुके हैं और एमआरसी श्रेणी के हैं, उनके सहित याचीगण तीन माह में अर्जी दें। सरकार उस पर तीन माह के भीतर आदेश जारी करे, जिससे अगले सत्र से पहले उनकी तैनाती हो सके। याचिका के जरिए 31 अगस्त व दो सितंबर 2018 की मेरिट लिस्ट को रद करने और विज्ञापित 68500 पदों पर पुनरीक्षित चयन सूची जारी करने की मांग की गयी थी।

याचियों ने वरीयता जिलों में मेरिट के आधार पर तैनाती की भी मांग की थी। नौ जनवरी 2018 के शासनादेश से सहायक अध्यापकों की भर्ती शुरू की गयी। परीक्षा नियामक प्राधिकारी प्रयागराज ने सामान्य श्रेणी व ओबीसी का कटऑफ 45 प्रतिशत व एससी-एसटी का 40 प्रतिशत घोषित किया। बाद में योग्यता कटऑफ घटाया गया। मेरिट में चयनित आरक्षित श्रेणी के अभ्यर्थियों उनकी वरीयता के जिलों में नियुक्त नहीं किया गया। इस भर्ती में 41556 अभ्यर्थी सफल घोषित हुए हैं। शासनादेश के तहत हर श्रेणी के अभ्यर्थियों को उनकी वरीयता के जिले में तैनात किया गया। एमआरसी अभ्यर्थियों के साथ विभेद किया गया। मेरिट में आगे होने के बावजूद इन्हें वरीयता के जिले नहीं मिले और कम मेरिट वाले आरक्षित श्रेणी के अभ्यर्थियों को वरीयता के जिले आवंटित किए गए। नियुक्तियां दो चरणों में की गयी। पहली में 34660 व दूसरी में 6136 अभ्यर्थियों की नियुक्ति की गयी। जब एक ही चयन प्रक्रिया के तहत चयनित थे। सभी ने च्वाइन कर लिया है लेकिन यह कानून के विपरीत किया गया। केवल एमआरसी अभ्यर्थियों की तैनाती के आदेश रद हुए। उन्हें नए सिरे से तैनाती की जानी है।

हाईकोर्ट ने मनमाने तरीके से शिक्षकों की तैनाती का आदेश रद किया

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