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एक छत के नीचे 'प्राइमरी का मास्टर' से जुड़ी शिक्षा विभाग की समस्त सूचनाएं एक साथ

GEET : और छाले हैं उपेक्षित पाँव रोए जा रहे हैं -दयानन्द त्रिपाठी व्याकुल

​गीत लिखे जा रहे हैं ताज पर, जागीर पर।
और छाले हैं उपेक्षित 
पाँव रोए जा रहे हैं!!

​भूख की चिल्लाहटों पर कौन स्वर परिधान देगा,
धूल में लिपटी व्यथा को कौन अब भी मान देगा।
स्वर्ण-प्रसादों की  आभा  गा रहा है  हर सुखनवर,
फूटते छप्पर को कवि अपनी कलम का दान देगा।

​गीत हैं कुर्बान महलों की कनक-तस्वीर पर,
दीन कुटियों के उजाले दर्द ढोए जा रहे हैं!
और छाले हैं उपेक्षित, 
पाँव रोए,  जा रहे हैं!!

​सत्य की आवाज़ पर दरबारी पहरा लग गया है,
चाटुकारों की सभा में  मान गहरा  लग गया है।
राग - दरबारी   बजाकर  जो  प्रशंसा  बेचते  हैं,
लेखनी पर आज उनके स्वार्थ-चेहरा लग गया है।

​व्यस्त हैं सब भाग्य की उलझी हुई तकदीर पर,
कर्म  के  औजार  पसीने  में  डुबोए  जा रहे हैं!
और छाले हैं उपेक्षित,
पाँव रोए, जा रहे हैं!!

​रूप की मदहोशियों में खो गया दायित्व सारा,
भूल बैठे कलमकार आज अपना लक्ष्य सारा।
सिर्फ अधरों की हँसी के सुर मिलाए  जा रहे हैं,
देखते  तक भी नहीं  जब टूटता  कोई  सितारा!

​मस्त हैं सब रेशमी परिधान की तहरीर पर,
कंटकों  के बीच  नंगे पाँव  सोए  जा रहे हैं!
और छाले हैं उपेक्षित, 
पाँव रोए  जा रहे हैं!!
        - दयानन्द त्रिपाठी व्याकुल 

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