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एक छत के नीचे 'प्राइमरी का मास्टर' से जुड़ी शिक्षा विभाग की समस्त सूचनाएं एक साथ

पहली बार केन्द्र किया महसूस ; पढ़ाई की राह में शिक्षा का अधिकार अधिनियम के रोड़े : व्यवस्थाएं व नीति नियम भी जिम्मेदार, हर स्तर पर समीक्षा की जरूर

पहली बार केन्द्र किया महसूस ; पढ़ाई की राह में शिक्षा का अधिकार अधिनियम के रोड़े : व्यवस्थाएं व नीति नियम भी जिम्मेदार, हर स्तर पर समीक्षा की जरूर

कानपुर। प्राथमिक व जूनियर शिक्षा पर अरबों रुपये सालाना खर्च पर शिक्षा का स्तर यह है कि जूनियर के बच्चे ‘उज्ज्वल’ शब्द सहीं लिख पाते। आठवीं के बच्चों को 10 तक का शुद्ध पहाड़ा नहीं आता। इसके लिए दोषी पढ़ाने वाले वे शिक्षक जिनके वेतन पर करोड़ों खर्च हो रहे हैं? पर सच यह भी नही है क्योंकि पढ़ाई की राह के और भी कई स्पीडब्रेकर हैं जिनमें शिक्षा अधिकार अधिनियम के कुछ नियमों को भी माना जा रहा है। पहली बार केंद्र सरकार ने भी ऐसा महसूस किया है।

मानव संसाधन राज्यमंत्री रामशंकर कठेरिया के यह स्वीकारी कि शिक्षा अधिकार अधिनियम में कक्षा आठ तक न फेल करने की व्यवस्था पढ़ाई पर भारी पड़ रही है, इससे फिर से बहस शुरू हो गयी है। शिक्षाविद् कहते हैं कि इसके लिए शिक्षकों की उदासीनता तो जिम्मेदार है ही, व्यवस्थाएं व नीति नियम भी कम जिम्मेदार नहीं हैं। मानव संसाधन राज्यमंत्री बदलाव के जो संकेत दे रहे हैं, उन पर हर स्तर पर समीक्षा की जरूरत है।

कमजोर माने जा रहे ये बिंदु

नियम: किसी भी बच्चे को किसी कक्षा में रोका नहीं जाएगा। न ही स्कूल से निष्कासित किया जाएगा।
प्रभाव : शिक्षकों ने परिणाम की चिंता छोड़ दी और बच्चे फेल होने के दबाव से बाहर हो गए। 
नियम : किसी भी बच्चे को किसी तरह का दंड नहीं दिया जाएगा।
प्रभाव : गलती करने पर भी शिक्षक डांट फटकार करने से भी कतराने लगे। बच्चों में अनुशासनहीनता व मनमानी बढ़ी।
नियम: 6 वर्ष की उम्र से अधिक के बच्चों को उम्र के आधार पर दाखिला दिया जाएगा यदि बच्चे का ज्ञान संबंधित कक्षा के लिए उपयुक्त नहीं है तो उसे विशेष प्रशिक्षण दिया जाएगा।
प्रभाव : बड़ी उम्र के बच्चे भी कक्षा एक में दाखिला पा जाते हैं। बच्चे जब चाहते हैं स्कूल छोड़ जाते और जब चाहते हैं प्रवेश ले लेते हैं। प्रशिक्षण के लिए अलग से कोई व्यवस्था नहीं है।
नियम: तीन साल से अधिक उम्र के बच्चों को प्रारंभिक शिक्षा के लिए तैयार करने के लिए सरकार पूर्व स्कूल शिक्षा का प्रबंध कर सकती है।
प्रभाव : सरकार इसकी व्यापक तैयारी नहीं कर सकी। निजी शिक्षण संस्थानों में बच्चे तीन साल से पढ़ाई करने लगते हैं जबकि सरकारी में 6 या 6 साल की आयु के बाद।
नियम: किसी भी बच्चे से किसी तरह का शुल्क नहीं लिया जाएगा।
प्रभाव : किसी तरह मूल्य चुकाए बिना मिल रही शिक्षा के प्रति अधिकतर अभिभावक गंभीर नहीं।

और भी हैं स्पीडब्रेकर

√स्कूलों में उपयुक्त अवस्थापना सुविधाओं के न होने से नहीं बन पाता पढ़ाई का वातावरण।
√शिक्षकों की कमी होने से एक कमरे में लगती कई-कई कक्षाएं।
√शिक्षकों को शिक्षा से इतर कामों, एमडीएम, जनगणना, बीएलओ, यूनीफॉर्म वितरण में लगाने से भी नुकसान।
√निरीक्षण की प्रभावी व परिणाममूलक व्यवस्था नहीं।
√विशिष्ट बीटीसी के रास्ते से पब्लिक स्कूलों से आए तमाम शिक्षकों को नहीं आती ठीक से हिन्दी।
√अभिभावकों में जागरूकता का घोर अभाव।
शिक्षकों की जवाबदेही तय करने की कोई कारगर व्यवस्था नहीं।

फेल करने से बच्चे हतोत्साहित होते हैं परंतु जब तक बच्चे को संबंधित कक्षा के बराबर का ज्ञान न हो जाए, उसे वही कोर्स पढ़ाना उपयुक्त होगा। स्तर प्राप्ति के बाद ही आगे की पढ़ाई कराई जाए। सतत मूल्यांकन की नवीन प्रणाली से समाधान संभव है।’’
- कृष्णमोहन त्रिपाठी पूर्व शिक्षा निदेशक माध्यमिक

शिक्षा अधिकार अधिनियम की समीक्षा होनी चाहिए। जो बिंदु पढ़ाई पर विपरीत प्रभाव डालने वाले हैं, उनमें सकारात्मक परिवर्तन अपेक्षित हैं।
- डॉ. एसपी पांडेय पूर्व निदेशक बेसिक शिक्षा

        खबर साभार : दैनिकजागरण

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