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एक छत के नीचे 'प्राइमरी का मास्टर' से जुड़ी शिक्षा विभाग की समस्त सूचनाएं एक साथ

कुकुरमुत्ते की तरह गली-गली अंग्रेजी स्कूल....सो हम आप झूठी दुहाई देते फिरते हैं rte-2009 की | तो प्रश्न खड़ा होता है कि क्या rte का कड़ाई से पालन करना सिर्फ सरकारी विद्यालयों के लिए ही लागू होता है या इन अंग्रेजी स्कूलों के लिए भी है ?

चूंकि अर्थ के इस जुग में सरकारें (अर्थात व्यक्तिवाद जो धन के पीछे दौड़ता भागता नजर आता है तरीका गलत है इससे फर्क नहीं पड़ता ) भी कहीं न कहीं सरकारी विद्यालयों को अब तोड़ने की भूमिका में नजर आते हैं कारण आज से पहले के समय पर नजर डालें तो क्या इस तरह से मान्यताएं देने का दौर था? और इसी की आड़ में कुकुरमुत्ते की तरह आज गली-गली में अंग्रेजी स्कूल दिखाई पड़ रहे हैं |

सो स्वभावत: लोगों का सरकारी स्कूलों पर अविश्वास और अंग्रेजी स्कूलों पर विश्वास बढ़ता जा रहा है | इस कारण व्यवसाय के दौर को बढ़ावा देना है तो शोषण तो होना ही है क्योंकि लगाम न सरकार के हाथ में न आम जन के |

   सो हम आप झूठी दुहाई देते फिरते हैं rte-2009 की | तो प्रश्न खड़ा होता है कि क्या rte का कड़ाई से पालन करना सिर्फ सरकारी विद्यालयों के लिए ही लागू होता है या इन अंग्रेजी स्कूलों के लिए भी है ?

Sanjay Sinha की कलम से-

कल मुझे मेरी सोसाइटी का माली मिल गया। उसके हाथों में ढेरों किताबें थीं। दुआ सलाम के बाद उसने मुझसे बीस हज़ार रुपए बतौर उधार मांगे। ज़ाहिर है मेरी जिज्ञासा ये जानने में थी कि आखिर अचानक इतने रुपयों की उसे क्या ज़रूरत आ पड़ी। मैंने यूं ही पूछ लिया तो उसने बताया कि उसका बेटा पांचवी से छठी कक्षा में गया है और स्कूल वाले कह रहे हैं कि अगली क्लास में जाना, मतलब दुबारा दाखिला।

मैंने पूछा, “स्कूल बदल गया है क्या?”“नहीं, स्कूल तो वही है।
वो पहली कक्षा से वहीं पढ़ रहा है। लेकिन स्कूल वाले कहते हैं कि हर साल दुबारा एडमिशन चार्ज लगेगा। हर साल यूनीफॉर्म लेनी होगी, हर साल किताबें खरीदनी होंगी। इतना सब होने के बाद महीने की जो फीस है वो तो देनी ही है।”

मैं जानता हूं कि हमारी सोसाइटी के पौधों को रोज खाद-पानी देने वाले माली की माली हालत ऐसी नहीं कि वो इस तरह अचानक आए खर्च को भुगत सके। ये भी जानता हूं कि मुहल्ले के सरकारी स्कूलों पर जैसे मुझे भरोसा नहीं, उसी तरह उसे भी भरोसा नहीं। उसे भी अंग्रेजी स्कूल में बच्चे को पढ़ा कर बाबू बनाना है। और उसकी इसी चाहत का फायदा कुकुरमुते की तरह गली मुहल्ले में उग आए अंग्रेजी स्कूल वाले उठा रहे हैं। माली के हाथों में किताबें थीं। मैंने पूछा कि इन किताबों को खरीद कर ला रहे हो क्या? उसने बहुत रूंआसा होकर कहा, “सर इसे बेचने जा रहा हूं। पिछले साल की किताबें हैं। हज़ार रुपए में खरीदी थी, सौ रुपए में रद्दी वाला लेगा।”“रद्दी वाला?”“जी, अब नए साल की नई किताबें खरीदनी हैं।”

मुझे अचानक याद आया कि जिन दिनों मैं अमेरिका में था, मेरा बेटा वहां के स्कूल में पांचवीं कक्षा में पढ़ रहा था, एडमिशन के साथ ही स्कूल की लाइब्रेरी से उसे सारी किताबें मिल गई थीं। और जब वो पांचवीं से छठी में गया, तो पुराने क्लास की किताबें वापस लाइब्रेरी में चली गईं और नई किताबें उसे दे दी गईं। वहां के स्कूल में बच्चों की किताबें स्कूल में ही उनकी आलमारी में रखी रहती थीं, बच्चे सिर्फ कॉपी,पेंसिल लेकर स्कूल जाया करते थे। स्कूल में साल दर साल उन्हीं किताबों के सेट से सभी बच्चों को पढ़ाने का काम होता है।

माली जब मुझसे कह रहा था कि यहां हर साल सभी बच्चों को नई किताबें खरीदनी होती हैं, तो मुझे ये भी याद आया कि - अमेरिका दुनिया का सबसे अमीर देश है और भारत बहुत गरीब देश है। अमीर देश साल दर साल बच्चों से किताब नहीं खरीदवाता। हम साल दर साल हर बच्चे से एक ही किताब खरीदवाते हैं और पुरानी किताबें रद्दी वाले को बेच देते हैं। हम चीख-चीख कर पर्यावरण बचाने की बातें करते हैं, पेड़ नहीं काटने की दुहाई देते हैं पर हर साल पुरानी किताबें संभाल कर उन्हें ही नहीं पढ़ा पाते।

आपको एक और बात बताऊं?जिन दिनों मुझे अमेरिका जाना था, अपने बेटे के स्कूल की प्रिंसिपल से मैं मिलने गया था। उनके कमरे के बाहर कम से कम पचास माता-पिता उनसे मिलने के लिए इंतज़ार कर रहे थे। गरमी का दिन था। बाहर लोग बेहाल बैठे अपनी बारी का इंतज़ार कर रहे थे। मुझसे प्रिसिंपल की सेक्रेट्री ने कहा कि मैडम अभी बहुत बिजी हैं, मीटिंग चल रही है। मैं भी बाहर बैठ गया। घंटा भर बीत गया, प्रिंसिपल साहिबा नहीं मिलीं, तो मैं जबरन उनके कमरे में घुस गया। वहां वो अपनी एक सहेली के साथ सोफे पर बैठ कर एसी की ठंडी-ठंडी हवा के बीच आराम से गरम-गरम कॉफी पी रही थीं।

मैंने उनसे पूछा, “लोग बाहर गरमी में आपका इंतज़ार कर रहे हैं और ये आपकी मीटिंग चल रही है?”इस पर वो नाराज़ हो गईं।मैं अमेरिका के उस स्कूल में यूं ही लोगों से पूछता-पूछता अपने बेटे के साथ पहुंच गया था। वहां मैंने प्रिंसिपल से मिलने की इच्छा जताई। कुल मिला कर दो मिनट के बाद प्रिंसिपल मेरे सामने थीं। मैंने दाखिले की बात की तो उसने मुस्कुराते हुए कहा, “क्यों नहीं। ज़रूर। आप कल सुबह आ जाइए।”ऐसे ही लिखते-लिखते मुझे याद आया कि हमारी परंपराएं तो महान हैं, अमेरिका के लोग तो संस्कारहीन हैं।फिलहाल मेरी इन कोरी भावनाओं से कुछ नहीं होने वाला। माली को बीस हज़ार चाहिए थे, उसका जुगाड़ किया और चल पड़ा अपने दफ्तर की ओर।

#Rishtey Sanjay Sinha

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