परिषद के विद्यालय खर्च में हीरो, पढ़ाई में जीरो-
#नोट-इस खबर पर गौर करेगें कि हमारे शिक्षक भाईयों पर प्रश्न चिन्ह खड़े हो रहे हैं.....इस खबर को आप तक देने का मेरा मकसद सिर्फ इतना है कि हमें अपने कार्यों के प्रति सचेत रहना चाहिए |
१-शिक्षकों में गंभीरता की कमी
२- निरीक्षण होते पर जवाबदेही नहीं
३- बच्चों की उपस्थिति पर सख्ती नहीं - क्लास वर्क व होम वर्क नहीं कराते
४- एक कक्ष में लगतीं कई-कई कक्षाएं
५- शिक्षकों से लिए जाते दूसरे कार्य
डॉ. सुरेश अवस्थी, कानपुर: क्या आपको पता है कि जिले के परिषदीय स्कूलों में पठन-पाठन पर सालाना कितना खर्च होता है। नहीं जानते, तो हम बताते हैं। 188 लाख रुपये। यह जान लिया है तो अब आपको जबर्दस्ती बताएंगे कि इतने खर्च के बाद बच्चों की पढ़ाई का स्तर क्या है? तमाम स्कूलों में छठवीं कक्षा के बच्चों को दस का पहाड़ा तक नहीं आता। अंग्रेजी की वर्णमाला के मामले में कई स्कूलों में 'काला अक्षर भैंस बराबर' वाली स्थिति है। यह शर्मनाक तस्वीर टास्क फोर्स ने बीएसए को सौंपी है।
अब यह भी जान लीजिए कि किस-किस मद में खर्च होता है। बेसिक शिक्षा परिषद के प्राथमिक व जूनियर स्कूलों के बच्चों को दो सेट नि:शुल्क यूनीफार्म, नि:शुल्क पुस्तकें तथा दोपहर का मुफ्त भोजन जैसी सुविधाएं दी जाती हैं। इसमें एक सवाल जरूर खड़ा होता है कि शिक्षकों की बेहद कमी है तो तस्वीर इतनी खराब भी नहीं है कि शिक्षा का स्तर रसातल में चला जाए। शहरी क्षेत्र को छोड़ दें तो शेष विद्यालयों में कमोवेश जरूरत भर के शिक्षक हैं। फिर भी शासन की ओर से गठित टास्क फोर्स की रिपोर्ट बताती है कि पढ़ाई की गुणवत्ता का बहुत ही बुरा हाल है। यह टास्क फोर्स हर माह कुछ विद्यालयों में शिक्षा के स्तर का आकलन करती है।
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तस्वीर-1: जूनियर स्कूल, छपरेटा (भीतरगांव)
पढ़ाई का स्तर : 8 वीं कक्षा के बच्चे 12 से अधिक का पहाड़ा नहीं सुना पाए। अंग्रेजी की पूरी वर्णमाला (एबीसीडी.. नहीं लिख पाए। छठवीं के बच्चे 6 के आगे का पहाड़ा नहीं सुना सके।
तस्वीर -2: प्राथमिक स्कूल प्रतापपुर प्रथम
पढ़ाई का स्तर : बच्चों को अंग्रेजी वर्णमाला नहीं आती। 5 वीं कक्षा के बच्चे हिंदी की पुस्तक नहीं पढ़ पाते।
तस्वीर-3: जूनियर स्कूल महाराजपुर
पढ़ाई का स्तर : लिखित काम नहीं मिला। 6 से 8 वीं कक्षा के बच्चे सरल प्रश्नों का भी उत्तर नहीं दे पाए।
तस्वीर -4: प्राथमिक स्कूल डंबरपुर (चौबेपुर)
पढ़ाई का स्तर : पांचवीं के बच्चों का भी हिंदी भाषा ज्ञान बिलकुल कमजोर। कुछ को ही 13 तक का पहाड़ा याद था।
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जिले की तस्वीर
जिले में स्कूल : 1603
प्राथमिक स्कूलों में बच्चे : 1,25,662
जूनियर स्कूलों में बच्चे : 46,159
बच्चों की कुल संख्या : 1,71,821
जिले में सालाना खर्च----
मिडडे मील : 25 करोड़
वेतन,ड्रेस, किताबों का : 163 करोड़ कुल खर्च : 188 करोड़
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क्या हैं कारण :
- शिक्षकों में गंभीरता की कमी
- निरीक्षण होते पर जवाबदेही नहीं
- बच्चों की उपस्थिति पर सख्ती नहीं - क्लास वर्क व होम वर्क नहीं कराते
- एक कक्ष में लगतीं कई-कई कक्षाएं
- शिक्षकों से लिए जाते दूसरे कार्य
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इन स्कूलों की छवि दोयम दर्जे की बन गई है। शिक्षक, अभिभावक, अधिकारी पढ़ाई के प्रति गंभीर नहीं हैं। जवाबदेही भी नहीं है। जिम्मेदारी तय करके सख्त कार्रवाई किए जाने की जरूरत है।
- डॉ. एलपी पांडे, पूर्व निदेशक बेसिक शिक्षा।
निरीक्षण की नवीन प्रणाली में खानापूरी नहीं हो सकेगी। शिक्षकों को जिम्मेदारी निभानी चाहिए। अंदर से अनुशासन पैदा करने की कोशिश है।
- दिनेश बाबू शर्मा, निदेशक बेसिक शिक्षा
खबर साभार : दैनिक जागरण
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