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एक छत के नीचे 'प्राइमरी का मास्टर' से जुड़ी शिक्षा विभाग की समस्त सूचनाएं एक साथ

लाख किए जतन, पढ़ाई में न लगा मन : परिषदीय स्कूलों में बच्चों को मुफ्त की सुविधाएं नहीं डाल रही प्रभाव-

लाख किए जतन, पढ़ाई में न लगा मन : परिषदीय स्कूलों में बच्चों को मुफ्त की सुविधाएं नहीं डाल रही प्रभाव-

शनिवार, 06 सितम्बर 2014 06:04 AM (IST)

कानपुर  : बड़ी कोशिशें हुईं कि बच्चे परिषदीय स्कूलों में पढ़ने के लिए आएं। मुफ्त पढ़ाई के लिए उन्हें मुफ्त किताबें दी गईं। दो-दो सेट ड्रेस दिए गए। दोपहर का खाना भी स्कूलों में मुफ्त दिया गया। फिर भी पढ़ाई में बच्चों का मन नहीं लगा। पांच हजार बच्चे इस सत्र में घट गए। बीच की कक्षाओं में भी बच्चे कम हो रहे हैं। यह स्थिति अनिवार्य शिक्षा अधिकार कानून व सर्व शिक्षा अभियान को आईना दिखाने को काफी है।
यह पहला मौका था जब मुख्यमंत्री ने सभी सांसदों, विधायकों, ब्लाक प्रमुखों सहित अन्य जनप्रतिनिधियों को सीधे पत्र भेजकर स्कूलों में नामांकन के लिए अभिभावकों को प्रेरित करने की अपील की थी। फिर भी बच्चे कम होने से शिक्षा व्यवस्था कठघरे में है। जुलाई में चले स्कूल चलो अभियान के तहत अधिकतम बच्चों का नामांकन कराने की कोशिशें हुईं परंतु नतीजा शून्य।
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जिले की तस्वीर (कक्षा 1 से 5)
स्कूलों की संख्या : 1603
पिछले सत्र में बच्चे : 1,30, 831
चालू सत्र में नामांकन : 1,25,662
कम हुए बच्चे : 5169
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हाउस होल्ड सर्वे से उम्मीद

अब विभाग को हाउस होल्ड सर्वे से उम्मीद है, लेकिन जानकार लोग कहते हैं कि इससे ज्यादा उम्मीद इसलिए नहीं की जा सकती क्योंकि बीते सत्र के सर्वे में केवल 1232 बच्चे ही स्कूलों के बाहर मिले थे। स्कूल चलो अभियान व हाउस होल्ड सर्वे मलिन बस्तियों व बालश्रम में लगे बच्चों तक पहुंच ही नहीं पाता।
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क्या हैं कारण
- अभिभावकों में जागरूकता नहीं
- सुस्त रहा स्कूल चलो अभियान
- गांवों में निजी स्कूलों की बाढ़
- स्कूलों में पर्याप्त सुविधाएं नहीं
- गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के प्रयास शून्य
- बालिकाओं के शौचालयों की कमी
- शिक्षकों की अनुपस्थिति व कमी
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''जूनियर कक्षाओं में बच्चे बढ़े, प्राथमिक में कम हो गए। हाउस होल्ड सर्वे में संख्या बढ़ सकती है।''
- बृजेश शर्मा, जिला समन्वयक सर्व शिक्षा अभियान
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''व्यक्ति की खर्च करने की क्षमता बढ़ी है। बेहतर शिक्षा के लिए अभिभावक निजी स्कूलों की ओर जा रहे हैं। सरकारी स्कूलों को अपग्रेड करना होगा।''
- कृष्णमोहन त्रिपाठी, पूर्व बेसिक व माध्यमिक शिक्षा निदेशक।
   
     खबर साभार : दैनिक जागरण

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