MAN KI BAAT : शिक्षा नीति 2020 पांचवीं तक मातृभाषा में पढ़ाई, पांचवीं के बाद कौन सी भाषा माध्यम बनेगी इसकी जानकारी....... दैनिक दिशेरा सम्पादकीय

MAN KI BAAT : शिक्षा नीति 2020 पांचवीं तक मातृभाषा में पढ़ाई, पांचवीं के बाद कौन सी भाषा माध्यम बनेगी इसकी जानकारी....... दैनिक दिशेरा सम्पादकीय 

शिक्षा नीति 2020 : पांचवीं तक मातृभाषा में पढ़ाई 

केन्द्र सरकार ने नई शिक्षा नीति को मंजूरी दे दी है । 34 वर्ष पुरानी नीति में काफी बड़े बदलाव किए गए हैं । परिवर्तन प्राकृति का नियम है और बदलते समय के अनुसार परिवर्तन होने जरूरी भी हैं । किसी भी नीति की सार्थकता उसकी उपयोगिता के साथ जुड़ी होती है । जो नीति समय की आवश्यकताओं को पूरी नहीं करती उसमें बदलाव जरूरी है । जहां तक शिक्षा नीति में नए बदलाव करने का संबंध है इसमें पांचवी तक की शिक्षा मातृ भाषा या क्षेत्रीय भाषा में देने का प्रस्ताव है , मातृ भाषा का मामला बेहद पेचीदा है । भले ही सरकार ने मातृ भाषा की महत्वता को स्वीकार किया है लेकिन शिक्षा विशेषज्ञों का एक हिस्सा मातृ भाषा को ग्रेजुएट स्तर तक माध्यम बनाने का समर्थन करता है । कई राज्यों में ग्रैजुएट स्तर तक राज्य की क्षेत्रीय भाषा को माध्यम बनाया गया है । दूसरी तरफ इस तथ्य पर भी विचार करना होगा कि पांचवीं के बाद किसी अन्य भाषा को माध्याम बनाना कितना उपयुक्त रहेगा ? 
पांचवीं के बाद कौन सी भाषा माध्यम बनेगी इसकी जानकारी भी अभी सामने आनी है । देश के बंटवारे के समय से ही भाषा के मामले को लेकर विवाद चलता आया है । भाषा के मामले को भाषा वैज्ञानिक नजरिए से निपटाने की आवश्यकता है । भाषा के मामले में अवैज्ञानिक धारणाओं से बचना होगा । नई शिक्षा नीति में सरकार ने पेपरों के मूल्यांकन के दायरे को बढ़ाया है । विद्यार्थियों और उसके साथियों को भी शामिल किया है । यह भी देखना होगा कि इस तरह की प्रक्रिया कितनी लम्बी होती है । सरकार ने शिक्षा को रोजगार प्रमुख बनाने पर बल दिया है जो समय की आवश्यकता है । छठी कक्षा से वोकेशनल शिक्षा शुरू की जाएगी । मौजूदा समय में वोकेशनल शिक्षा के लिए आई . टी.आई. में दसवीं के बाद दाखिला लेना पड़ता है । 

निरूसंदेह शिक्षा को पेशेवर बनाना जरूरी है , ताकि दसवीं के बाद स्कूल छोड़ने पर विद्यार्थी कोई न कोई कौशल प्राप्त कर रोटी कमाने के योग्य बन सके । उच्च शिक्षा के मामले में एमफिल की डिग्री खत्म करना भी सही निर्णय है । एमए और पीएचडी के बीच अध्ययन के लिए किसी अलग डिग्री का कोई आधार नहीं रह जाता । जहां तक विज्ञान और कला वर्ग में अंतर खत्म करना है यह विद्यार्थियों को अध्ययन के लिए विषय चयन की आजादी देता है । शिक्षा नीति में बड़े परिवर्तन किए गए , लेकिन इसे लागू करने के लिए इसकी व्यवहारिकता को समझना जरूरी है । कम से कम भाषा के मामले में क्षेत्रीय भाषाओं का मामला महत्वपूर्ण है । 

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