Tuesday, September 24, 2019

MAN KI BAAT : पहली प्राथमिकता बने शिक्षा में सुधार कि क्योंकि निजी विद्यालयों में नकल की छूट होती है, अन्य देशों में भी पाया गया कि निजी विद्यालय अपने मानकों को कम करके अधिक संख्या में छात्रों को पास.....

MAN KI BAAT : पहली प्राथमिकता बने शिक्षा में सुधार

चीन के सबसे अमीर व्यक्ति जैक मा ने कुछ समय पहले विश्व आर्थिक मंच पर कहा था कि आर्थिक तरक्की जारी रखने के लिए हमें अपने बच्चों को ऐसी शिक्षा देने होगी कि वे मशीनों से मुकाबला कर सकें। उनके मुताबिक शिक्षा में सुधार इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का इस्तेमाल बढ़ता जा रहा है। शिक्षा में सुधार को लेकर भारत को इसलिए अधिक सक्रियता दिखाने की जरूरत है, क्योंकि उसके जरिये ही आर्थिक रूप से सशक्त हुआ जा सकता है। एक अर्से से यह दिख रहा है कि सरकारी और निजी स्कूलों के शिक्षकों के वेतन में अंतर के बावजूद सरकारी विद्यालयों के परिणाम कमतर हैं। इस वर्ष उत्तर प्रदेश बोर्ड के हाईस्कूल की 21 छात्रों की मेरिट लिस्ट में एवं 12 वीं की 14 छात्रों की मेरिट लिस्ट में एक भी छात्र सरकारी विद्यालय से नहीं था। इसी तरह दिल्ली में दसवीं के रिजल्ट में सरकारी विद्यालयों में 72 प्रतिशत छात्र पास हुए, जबकि निजी विद्यालयों में 93 प्रतिशत। 2016-17 में उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा प्राइमरी एवं सेकेंडरी शिक्षा पर 25,000 रु. प्रति छात्र खर्च किया जा रहा था, जो 2019-20 में लगभग 30,000 रु. होगा।

एक रपट के तहत बिहार के नौ जिलों में 4.3 लाख और झारखंड में 7.6 लाख फर्जी एडमिशन सरकारी विद्यालयों में पाए गए, क्योंकि इन दाखिलों के माध्यम से मध्यान्ह भोजन जैसी सुविधाओं का बजट बढ़ जाता है। यदि फर्जी छात्रों को हटा दिया जाए तो प्रति छात्र सरकारी खर्च 40,000 रु. पड़ सकता है। नेशनल सैंपल सर्वे के अनुसार 2014 में लगभग 64 प्रतिशत छात्र सरकारी स्कूलों में पढ़ रहे थे। आज शायद उनकी संख्या 55 प्रतिशत हो। यदि सभी छात्रों को शामिल कर लिया जाए तो सरकार 22,000 रु. प्रति छात्र प्रति वर्ष खर्च कर रही है चाहे वह सरकारी में पढ़ रहा हो अथवा निजी स्कूल में। यदि इसमें से आधी रकम यानी 11,000 रुपये प्रति वर्ष सभी छात्रों को यूनिवर्सल वाउचर के माध्यम से वितरित कर दिए जाएं तो प्रत्येक छात्र को लगभग 1,000 रुपये प्रति माह मिल जाएगा। सरकारी शिक्षा तंत्र में लगभग 90 प्रतिशत खर्च शिक्षकों केवेतन में लगता है। इन वाउचर से छात्र अपने मनचाहे स्कूल की फीस अदा कर सकेंगे और सहज ही हमारे छात्रों की शिक्षा में सुधार हो जाएगा। नेशनल सैंपल सर्वे द्वारा कराए गए सर्वेक्षण में पाया गया कि 2014 में प्राइवेट स्कूलों की औसत फीस 417 रु. प्रति माह थी। वर्तमान में यह 1000 रु. प्रति माह होगी। वाउचर व्यवस्था लागू होने पर सरकारी स्कूलों के लिए जरूरी होगा कि वे प्राइवेट स्कूलों से प्रतिस्पर्धा में छात्रों को आकर्षित करें जिससे उन्हें वाउचर मिल सकें। इस प्रकार सरकारी विद्यालयों को मजबूरन अपनी कार्यकुशलता में सुधार करना होगा। प्राइवेट स्कूलों को अच्छी फीस मिलेगी और सरकारी स्कूलों में प्रतिस्पर्धा उत्पन्न होगी। इससे दोनों में सुधार होगा।

अमेरिका के नेशनल ब्यूरो ऑफ इकोनॉमिक रिसर्च द्वारा किए गए एक अध्ययन में वाउचर से लाई गई प्रतिस्पर्धा के कारण सरकारी स्कूलों में सुधार पाया गया। कोलंबिया में पाया गया कि जिन छात्रों ने वाउचर के माध्यम से प्राइवेट स्कूलों में स्थानांतरण लिया उनका रिजल्ट उत्तम रहा। न्यूजीलैंड में पाया गया कि वाउचर व्यवस्था लागू होने के बाद सरकारी विद्यालयों में सुधार हुआ, क्योंकि वे अधिक संख्या में वाउचर प्राप्त करना चाहते थे। अपने देश में आंध्र प्रदेश में वाउचर व्यवस्था को प्रयोग के रूप में लागू किया गया तो पाया गया कि वाउचर के माध्यम से शिक्षा प्राप्त करने वाले छात्रों का अंग्रेजी और गणित में रिजल्ट अच्छा था। दिल्ली में पाया गया कि अंग्रेजी में प्रभाव अच्छा था, यद्यपि हिंदी और गणित में प्रभाव नहीं दिखा। लड़कियों की शिक्षा में वाउचर का विशेष लाभ दिखा। इन तमाम अध्ययनों से पता लगता है कि वाउचर की व्यवस्था से प्रतिस्पर्धा बढ़ती है और शिक्षा में सुधार आता है।

वाउचर व्यवस्था का नुकसान मुख्यत: असमानता को लेकर देखा जाता है। स्वीडन, न्यूजीलैंड, बेल्जियम, अमेरिका इत्यादि देशों में पाया गया कि वाउचर व्यवस्था से समाज के कमजोर वर्ग के छात्र पीछे रह जाते हैं और समृद्ध वर्ग के छात्र वाउचर के साथ अतिरिक्त धन देकर श्रेष्ठतम विद्यालयों में दाखिला ले लेते हैं, लेकिन इन देशों और हमारी परिस्थिति में मौलिक अंतर है। वहां हर छात्र को उसके क्षेत्र के सरकारी विद्यालय में ही दाखिला लेना होता है। जर्नल आफ इकोनॉमिक लिटरेचर में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार वाउचर से आंध्र प्रदेश में शिक्षा के स्तर में कुछ सुधार हुआ, लेकिन सामाजिक समानता पर असर नहीं पड़ा। अपने देश में कमजोर वर्ग के लोग अपने बच्चों को सरकारी विद्यालयों में भेजते हैं और समृद्ध वर्ग के लोग निजी विद्यालयों में। इसलिए अपने देश में वाउचर से केवल कमजोर को ऊपर बढ़ने में सहायता मिलेगी और उससे समानता स्थापित होगी। सरकारी विद्यालयों के कमजोर रिजल्ट का एक कारण यह बताया जाता है कि उनमें कमजोर वर्ग के छात्र आते हैं। यह बात सही है। इस समस्या का सीधा उपाय यह है कि कमजोर छात्रों को वाउचर देकर उन्हें अच्छे सरकारी अथवा प्राइवेट विद्यालयों में स्थानांतरित कर दिया जाए।

निजीकरण का एक नुकसान यह है कि निजी विद्यालयों में नकल की छूट होती है। अन्य देशों में भी पाया गया कि निजी विद्यालय अपने मानकों को कम करके अधिक संख्या में छात्रों को पास कर देते हैं। यह तर्क अपने देश में लागू नहीं होता,क्योंकि हमारे यहां सीबीएसई अथवा राज्य बोडोर्ं द्वारा परीक्षा ली जाती है जो निजी और सरकारी विद्यालयों को सामान परीक्षा व्यवस्था उपलब्ध कराते हैं। यदि हमें अपने युवाओं को अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा में खड़े होने की क्षमता देनी है तो सरकारी शिक्षकों को दिए जाने वाले वेतन में कटौती कर प्रति माह कुछ रकम सीधे सभी छात्रों को दे देना चाहिए, जिससे वे मनचाहे स्कूलों में दाखिला ले सकें। दूरस्थ ग्रामीण क्षेत्रों के लिए वाउचर की रकम को बढ़ाया जा सकता है जैसे हर छात्र को 1,000 के स्थान पर 2,000 रु. प्रति माह का वाउचर दिया जा सकता है। इससे दूरस्थ क्षेत्रों में सरकारी अथवा निजी, दोनों प्रकार के विद्यालय चल सकेंगे और वहां के छात्रों को भी उत्तम शिक्षा मिल सकेगी।
(लेखक आइआइएम बेंगलूर के पूर्व प्रोफेसर हैं)
डॉ. भरत झुनझुनवाला

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