MAN KI BAAT : परीक्षा की पवित्रता बरकरार रखते हुए प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालयों में पठन-पाठन का माहौल लगातार बेहतर कैसे रखा जाए अब चुनौती....

MAN KI BAAT : परीक्षा की पवित्रता बरकरार रखते हुए प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालयों में पठन-पाठन का माहौल लगातार बेहतर कैसे रखा जाए अब चुनौती....

कह के रहेंगे जागरण जनमत हां नहीं अब चुनौती है कि परीक्षा की पवित्रता बरकरार रखते हुए प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालयों में पठन-पाठन का माहौल लगातार बेहतर कैसे रखा जाए। अब चुनौती है कि परीक्षा की पवित्रता बरकरार रखते हुए प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालयों में पठन-पाठन का माहौल लगातार बेहतर कैसे रखा जाए। माधव जोशी कल का परिणाम क्या आप सुब्रमण्यम स्वामी के इस सुझाव से सहमत हैं कि जेट एयरवेज का एयर इंडिया में विलय कर दिया जाना चाहिए? कह नहीं सकते छल-कपट भरे चुनाव विभिन्न दलों की चुनाव प्रचार संबंधी गतिविधियों के साथ ही आदर्श आचार संहिता के उल्लंघन की जैसी खबरें लगातार आ रही हैं उससे यह नहीं लगता कि हमारे राजनीतिक दल लोकतांत्रिक तौर-तरीकों के अनुरूप चुनाव लड़ने के लिए प्रतिबद्ध हैं। अब तो यही अधिक लग रहा है कि राजनीतिक दल चुनाव संबंधी आदर्श आचार संहिता की कहीं कोई परवाह नहीं कर रहे हैं। यह स्थिति तब है जब इस संहिता का निर्माण खुद उन्होंने किया है। समस्या केवल यह नहीं है कि चुनाव प्रचार के मान्य तौर-तरीकों की जमकर अनदेखी की जा रही है, बल्कि यह भी है कि छल-कपट से चुनाव जीतने कोशिश हो रही है। पैसे बांटकर चुनाव जीतने की प्रवृत्ति किस तरह बढ़ती जा रही है, इसका प्रमाण यह है कि निर्वाचन आयोग अभी तक करीब 32 सौ करोड़ रुपये की नकदी जब्त कर चुका है। नि:संदेह यह नहीं कहा जा सकता कि निर्वाचन आयोग के अधिकारी वह सारी रकम जब्त करने में समर्थ हुए होंगे जो मतदाताओं को बांटने के लिए जमा की गई। यह भी नहीं कहा जा सकता कि उसकी सख्ती के चलते पैसे बांटने का सिलसिला थम गया है। एक समय पैसे बांटकर चुनाव जीतने की प्रवृत्ति केवल दक्षिण भारत में दिखती थी, लेकिन अब वह सारे देश में नजर आ रही है।1 चुनाव लड़ने के तौर-तरीकों में गिरावट का एक अन्य प्रमाण यह भी है कि नेता अपने विरोधियों की आलोचना करने में बदजुबान हुए जा रहे हैं। ऐसे नेताओं के खिलाफ कार्रवाई हो रही है, लेकिन लगता नहीं कि इसका असर पड़ रहा है। नेता एक-दूसरे की आलोचना करते समय केवल भाषा की मर्यादा ही नहीं तोड़ रहे हैं, बल्कि वे जाति-मजहब को भी भुना रहे हैं। कहीं जातीय आधार पर मतदाताओं को गोलबंद करने की कोशिश हो रही है तो कहीं मजहबी आधार पर। पता नहीं क्यों राजनीतिक दल यह साधारण सी बात समझने को तैयार नहीं कि अगर कुछ जातियों को गोलबंद करने की कोशिश की जाएगी तो शेष जातियां स्वत: गोलबंद होने की कोशिश करेंगी या फिर कोई उन्हें ऐसा करने के लिए कहेगा? इस बार एक और खराब बात यह भी देखने को मिल रही है कि नेता झूठ का सहारा लेने में लगे हुए हैं। वे ऐसी-ऐसी बातें कहने में कोई संकोच नहीं कर रहे हैं जिनका कहीं कोई आधार ही नहीं। इससे भी खराब बात यह है कि यदि कभी उनके झूठ को चुनौती दी जाती है तो वे यह कहकर बच निकलने की कोशिश करते हैं कि चुनाव प्रचार की गर्मी में गलत बात निकल गई। केवल इतना ही नहीं, नेता फर्जी खबरों का भी सहारा ले रहे हैं। ऐसा करके वे फर्जी खबरें गढ़ने वालों को बल ही प्रदान कर रहे हैं। वे सामाजिक माहौल में कटुता घोलने का भी काम कर रहे हैं। यह सही है कि निर्वाचन आयोग को और अधिकार संपन्न बनाए जाने की आवश्यकता है, लेकिन आखिर राजनीतिक दलों की भी कोई जिम्मेदारी बनती है। अगर वे नियम-कानूनों की अनदेखी करते हुए लोकतंत्र के बुनियादी सिद्धांतों को ताक पर रखेंगे तो फिर भारतीय लोकतंत्र और साथ ही चुनाव प्रक्रिया के मान-सम्मान की रक्षा कैसे होगी? बेहतरीन परीक्षाफल11यूपी बोर्ड के हाईस्कूल और इंटरमीडिएट परीक्षा परिणाम को बेहतरीन कहा जा सकता है। नकल पर सख्ती के बावजूद लगभग 70-80 फीसद परीक्षार्थियों के उत्तीर्ण होने से पहली नजर में संकेत मिलता है कि माध्यमिक विद्यालयों में पढ़ाई-लिखाई का माहौल बेहतर हुआ है। प्रदेश सरकार ने न सिर्फ नकल पर सख्ती से रोक लगाई बल्कि विद्यालयों में पढ़ाई का माहौल सुधारने का भी प्रयास किया। सुपरिणाम सामने है। बिना पढ़ाई नकलविहीन परीक्षा देकर हाईस्कूल में लगभग 80 फीसद और इंटरमीडिएट में 70 फीसद परीक्षार्थी उत्तीर्ण नहीं हो सकते। इस परीक्षा परिणाम के लिए राज्य सरकार का संपूर्ण शिक्षा तंत्र बधाई का पात्र है यद्यपि अब चुनौती है कि परीक्षा की पवित्रता बरकरार रखते हुए प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालयों में पठन-पाठन का माहौल लगातार बेहतर कैसे रखा जाए। इसके लिए राजनीतिक नेतृत्व को नफा-नुकसान की परवाह किए बगैर सख्त रुख अख्तियार करना होगा। सबसे पहले उन विद्यालयों और शिक्षकों का सार्वजनिक अभिनंदन किया जाना चाहिए जिनके प्रयास से परीक्षा परिणाम बेहतरीन रहा। उन विद्यालयों की भी सूची सार्वजनिक की जानी चाहिए जिनका परीक्षाफल बहुत खराब रहा। यह राज्य सरकार पर है कि वह ऐसे विद्यालयों और वहां के शिक्षकों पर कार्रवाई का साहस जुटा पाती है कि नहीं। ये विद्यालय हजारों बच्चों का भविष्य बर्बाद करने के लिए जिम्मेदार हैं लिहाजा लापरवाह विद्यालयों का अनुदान तो रोक ही दिया जाना चाहिए। इस परीक्षा परिणाम का सर्वाधिक उज्ज्वल पक्ष यह है कि शिक्षा और परीक्षा प्रणाली के प्रति आम लोगों का विश्वास वापस लौटा है। आगामी सत्र में इसे और मजबूत करने के उपाय किए जाने चाहिए। अभिभावक और विद्यार्थी चाहते हैं कि परीक्षा नकलविहीन हो, पर इसके लिए साल भर पढ़ाई होना जरूरी है। शिक्षकों की जिम्मेदारी है कि वे इसे अपने लिए चुनौती के तौर पर स्वीकार करें। शिक्षक कक्षाओं में जाने लगें तो विद्यार्थी स्वत: आएंगे। सरकार को एक ऐसा मॉनीटरिंग तंत्र भी विकसित करना चाहिए जिससे स्कूलों के माहौल के बारे में फीडबैक मिल सके। पहले विद्यालयों में तिमाही और छमाही परीक्षाएं पूरी गंभीरता के साथ होती थीं। इससे विद्यार्थियों और शिक्षकों को थाह मिल जाती थी। यह प्रणाली फिर शुरू की जानी चाहिए।

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