Tuesday, May 31, 2016

राजकीय माध्यमिक विद्यालयों की सहायक अध्यापिकाओं (प्रशिक्षित स्नातक वेतनक्रम महिला शाखा) की वर्ष 2007 से अब तक की अंतिम निर्विवादित वरिष्ठता सूची उपलब्ध कराने के सम्बन्ध में आदेश-निर्देश जारी ।

राजकीय माध्यमिक विद्यालयों की सहायक अध्यापिकाओं (प्रशिक्षित स्नातक वेतनक्रम महिला शाखा) की वर्ष 2007 से अब तक की अंतिम निर्विवादित वरिष्ठता सूची उपलब्ध कराने के सम्बन्ध में आदेश-निर्देश जारी ।

वित्तीय वर्ष 2016-17 में मध्यान्ह भोजन योजनान्तर्गत एम0 एम0 ई0 मद में प्रथम क़िस्त के रूप में (अप्रैल 2016 से जून 2016 तक) हेतु धनावंटन विषयक ।

वित्तीय वर्ष 2016-17 में मध्यान्ह भोजन योजनान्तर्गत एम0 एम0 ई0 मद में प्रथम क़िस्त के रूप में (अप्रैल 2016 से जून 2016 तक) हेतु धनावंटन विषयक ।

परिषदीय प्राथमिक विद्यालयों में कार्यरत शिक्षामित्रों के सहायक अघ्यापक के पद पर समायोजन के सम्बन्ध में शासन को तथ्यात्मक आख्या उपलब्ध कराने के लिए जारी आदेश ।

परिषदीय प्राथमिक विद्यालयों में कार्यरत शिक्षामित्रों के सहायक अघ्यापक के पद पर समायोजन के सम्बन्ध में शासन को तथ्यात्मक आख्या उपलब्ध कराने के लिए जारी आदेश ।

नवीन पेंशन योजना अन्तर्गत आच्छादित अध्यापकों/ कर्मचारियों के वेतन माह मई 2016 से कटौती के सम्बन्ध में ।

नवीन पेंशन योजना अन्तर्गत आच्छादित अध्यापकों/ कर्मचारियों के वेतन माह मई 2016 से कटौती के सम्बन्ध में ।

अब गुरुजी भी देंगे टेस्ट, होंगे पास और फेल : परीक्षा में फेल होने वाले शिक्षको को छह माह बाद फिर टेस्ट देना होगा, अफसरों के मुताबिक जुलाई से इस योजना पर अमल शुरू

अब गुरुजी भी देंगे टेस्ट, होंगे पास और फेल : परीक्षा में फेल होने वाले शिक्षको को छह माह बाद फिर टेस्ट देना होगा, अफसरों के मुताबिक जुलाई से इस योजना पर अमल शुरू
   
गोरखपुर। बेसिक व माध्यमिक स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता के लिए अब गुरुजी का भी टेस्ट होगा। परीक्षा में टॉप करने वाले शिक्षकों की ग्रेडिंग के हिसाब से सूची तैयार होगी। स्कूल की कक्षाओं में  इन शिक्षकों का  फोटो व नाम लगाया जाएगा। इस परीक्षा में फेल होने वाले शिक्षको को छह माह बाद फिर टेस्ट देना होगा। अफसरों के मुताबिक जुलाई से इस योजना पर अमल शुरू हो जाएगा।  

नई व्यवस्था में छात्रों के साथ अब गुरुजी लोगों को भी अपने विषय पर पकड़ बनानी होगी। नहीं तो वह विभागीय टेस्ट में फेल हो सकते हैं। टेस्ट लेने के पहले अधिकारियों को स्कूलवार बच्चों से एक-एक विषय के बारे में पूछा जाएगा। जिस विषय में जो बच्चा कमजोर मिलेगा या फिर वो कहेगा कि इस विषय के अध्यापक पढ़ाते ही नहीं है। उन लोगों की सूची तैयार की जाएगी। जो पास होगा उनकी ग्रेडिंग तैयार की जाएगी।

सहायता प्राप्त जूनियर हाई स्कूल के प्राइमरी प्रभाग को अनुदानित किये जाने के सम्बन्ध में आदेश-निर्देश जारी ।

सहायता प्राप्त जूनियर हाई स्कूल के प्राइमरी प्रभाग को अनुदानित किये जाने के सम्बन्ध में आदेश-निर्देश जारी ।

फंस गया 80 हजार सीटों पर बीटीसी का प्रवेश : सचिव परीक्षा नियामक प्राधुकारी की ओर से शासन के पास मई में प्रवेश प्रक्रिया शुरू करने का भेजा गया प्रस्ताव, शासन की हरी झंडी अब तक नहीं

फंस गया 80 हजार सीटों पर बीटीसी का प्रवेश : सचिव परीक्षा नियामक प्राधुकारी की ओर से शासन के पास मई में प्रवेश प्रक्रिया शुरू करने का भेजा गया प्रस्ताव, शासन की हरी झंडी अब तक नहीं

इलाहाबाद : प्रदेश के सरकारी एवं निजी बीटीसी कॉलेजों में खाली बीटीसी प्रशिक्षण की 80 हजार सीटों का प्रवेश फंस गया है। सचिव परीक्षा नियामक प्राधिकारी की ओर से बीटीसी प्रवेश-2015 के लिए शासन से अनुमति नहीं मिलने से बीटीसी की खाली सीटों पर प्रवेश नहीं हो पा रहा है। परीक्षा नियामक की ओर से शासन के पास मई में प्रवेश प्रक्रिया शुरू करने का प्रस्ताव भेजा गया था।

प्रदेश में इस समय कुल 63 जिला शिक्षण एवं प्रशिक्षण संस्थान (डायट) एवं 1415 निजी बीटीसी कॉलेज हैं। सरकारी डायट में कुल मिलाकर 10450 सीटें खाली हैं। इसके साथ 1034 निजी बीटीसी कॉलेजों में प्रवेश प्रक्रिया पहले से चल रही है, जबकि 381 बीटीसी कॉलेजों में प्रवेश के लिए शासन से अनुमति मिल चुकी है। इस प्रकार कुल मिलाकर 1415 निजी बीटीसी कॉलेजों में 50 सीट के हिसाब से कुल मिलाकर 70750 सीटें आती हैं।

इस प्रकार सरकारी एवं निजी कॉलेजों कुल मिलाकर 82200 सीटें खाली हैं। पहले से प्रवेश की समस्या को लेकर परेशान निजी बीटीसी कॉलेजों के प्रबंधन की इस कारण से परेशानी बढ़ गई है। सचिव परीक्षा नियामक प्राधिकारी की ओर से होने वाला बीटीसी प्रवेश फंस गया है। शासन की ओर से प्रवेश प्रक्रिया को हरी झंडी नहीं दिखाए जाने के कारण परीक्षा नियामक की ओर से प्रदेश के सरकारी एवं निजी बीटीसी कॉलेजों की 80 हजार सीटों पर प्रवेश नहीं हो पा रहा है।

स्थानांतरित शिक्षकोंं के वरिष्ठता की विसंगति खत्म करने की मांग को लेकर धरना दे रहे शिक्षक : बेसिक शिक्षा मंत्री के आश्वासन के बाद समाप्त हुआ धरना

स्थानांतरित शिक्षकोंं के वरिष्ठता की विसंगति खत्म करने की मांग को लेकर धरना दे रहे शिक्षक : बेसिक शिक्षा मंत्री के आश्वासन के बाद समाप्त हुआ धरना

रायबरेली में दलित 407 शिक्षक नहीं होंगे रिवर्ट : बेसिक शिक्षा निदेशक के निर्देश के बाद बीएसए ने किया पदावनति आदेश किया निरस्त

रायबरेली में दलित 407 शिक्षक नहीं होंगे रिवर्ट : बेसिक शिक्षा निदेशक के निर्देश के बाद बीएसए ने किया पदावनति आदेश किया निरस्त

बीएड में बढ़ सकती हैं सात हजार सीटें : बीएड में दाखिले के लिए इस बार करीब 3.02 लाख अभ्यर्थी अर्ह घोषित किए गए

बीएड में बढ़ सकती हैं सात हजार सीटें : बीएड में दाखिले के लिए इस बार करीब 3.02 लाख अभ्यर्थी अर्ह घोषित किए गए

जासं, लखनऊ : सूबे में बीएड के दो वर्षीय कोर्सेज में करीब सात हजार सीटें इस बार बढ़ सकती है। इस बार 70 से 80 नए कॉलेज जुड़ेंगे। सोमवार को कॉलेज संबद्धता का अंतिम दिन था, ऐसे में सभी विश्वविद्यालयों से कॉलेज व सीटों का अंतिम ब्यौरा पहुंचाया जा रहा है। फिलहाल इस सत्र में करीब सात हजार सीटें बढ़ेंगी।

बीएड की प्रवेश परीक्षा का आयोजन इस बार लखनऊ विश्वविद्यालय (लविवि) ने करवाया है। बीएड की संयुक्त प्रवेश परीक्षा के राज्य कोआर्डिनेटर प्रो. वाईके शर्मा ने बताया कि इस बार लगभग सात हजार सीटें बढ़ने की उम्मीद है। अभी सभी विश्वविद्यालय अपना अंतिम डाटा भेज रहे हैं। दो वर्षीय बीएड कोर्स में दाखिले का परिणाम घोषित किया जा चुका है। अब प्रवेश काउंसिलिंग छह जून से शुरू होगी। पिछले वर्ष बीएड में करीब 1.84 लाख सीटें थी। इस बार इसमें लगभग सात हजार नई सीटें जुड़ेंगी तो यह आंकड़ा दो लाख के पार हो जाएगा। बीएड में दाखिले के लिए इस बार करीब 3.02 लाख अभ्यर्थी अर्ह घोषित किए गए हैं। ऐसे में ज्यादातर अभ्यर्थी दाखिला पाने में सफल होंगे।

अब सीटों को लेकर बिफरे शिक्षामित्र : 16448 सीटों पर समायोजन कराने की जुगत में थे शिक्षामित्र, शासन के फरमान को न्यायालय में ही चुनौती देने की तैयारी

अब सीटों को लेकर बिफरे शिक्षामित्र : 16448 सीटों पर समायोजन कराने की जुगत में थे शिक्षामित्र, शासन के फरमान को न्यायालय में ही चुनौती देने की तैयारी

राज्य ब्यूरो, इलाहाबाद : सीटों के आवंटन के साथ ही शिक्षामित्रों के समायोजन का मुद्दा फिर सतह पर आ गया है। शिक्षामित्र विभागीय अफसरों से गुहार लगा रहे हैं कि जब तक सुप्रीम कोर्ट का फरमान न आ जाए, तब तक 16448 सीटों पर नियुक्तियां न की जाएं। असल में इन नवसृजित पदों पर समायोजन की शिक्षामित्र उम्मीद संजोए थे, जो फिलहाल टूटती नजर आ रही है।

बेसिक शिक्षा परिषद के विद्यालयों में शिक्षक बनने के लिए इन दिनों तेजी से प्रयास जारी हैं। परिषदीय स्कूलों में 19948 नए पद सृजित हुए, उनमें से 3500 पद उर्दू शिक्षकों को दे दिए गए हैं। शेष पदों को लेकर कशमकश जारी थी। 15 हजार शिक्षक भर्ती के अभ्यर्थी लगातार यह पद देने की मांग कर रहे थे। उनका दावा था कि कई अलग-अलग वर्गो के अभ्यर्थियों को आवेदन करने का मौका मिला इसलिए संख्या इतनी अधिक हो गई है कि पद बढ़ाना जरूरी है। पिछले माह बेसिक शिक्षा परिषद सचिव ने इस संबंध में शासन को प्रस्ताव भी भेजा था। अंत में शासन ने न्यायालय का निर्देश लेकर 15 हजार शिक्षक भर्ती के पद बढ़ाने पर सहमति दे दी है।

इसके बाद से शिक्षामित्र परेशान हैं। उनका कहना है कि अभी 26 हजार शिक्षामित्रों का समायोजन होना शेष है जब सारे पद भर जाएंगे तो वह कहां समायोजित होंगे। इसलिए इन पदों पर फिलहाल नियुक्ति न की जाए बल्कि सुप्रीम कोर्ट में चल रही शिक्षामित्रों की सुनवाई खत्म होने का इंतजार किया जाए। विभागीय अफसरों से अनुरोध के साथ ही कोर्ट में भी इस आशय की याचिका दायर करने की तैयारी है। उप्र दूरस्थ बीटीसी शिक्षक संघ के प्रदेश अध्यक्ष अनिल कुमार यादव ने कहा है कि शासन को शिक्षामित्रों का ध्यान रखना होगा। इसलिए इन पदों पर नियुक्तियों में जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए। इस मामले को लेकर शासन एवं परिषद में जल्द ही ज्ञापन भी दिया जाएगा।

ताकि हो सके खंड शिक्षा अधिकारियों की भर्ती : सेवा नियमावली तैयार करने में जुटा शिक्षा विभाग

ताकि हो सके खंड शिक्षा अधिकारियों की भर्ती : सेवा नियमावली तैयार करने में जुटा शिक्षा विभाग

राज्य ब्यूरो, लखनऊ : ब्लाक स्तर पर बेसिक शिक्षा की कमान संभालने वाले खंड शिक्षा अधिकारियों की भर्ती का रास्ता जल्दी खुल सकेगा। राजपत्रित अधिकारियों का दर्जा पाये खंड शिक्षा अधिकारियों की सेवा नियमावली को शासन अंतिम रूप देने में जुटा है। नियमावली के तहत खंड शिक्षा अधिकारियों का चयन पीसीएस परीक्षा (उप्र प्रवर अधीनस्थ चयन सेवा) के जरिये कराने का इरादा है।

जुलाई 2011 में काडर रिव्यू के जरिये उप विद्यालय निरीक्षक (डीआइ) और प्रति उप विद्यालय निरीक्षक (एसडीआइ) के संवर्गो को मिलाकर खंड शिक्षा अधिकारी पदनाम का नया संवर्ग बनाया गया था। उसी समय खंड शिक्षा अधिकारियों का ग्रेड वेतन 2800 से बढ़ाकर 4800 रुपये कर दिया गया था। इस आधार पर कि जब वे प्राथमिक और उच्च प्राथमिक विद्यालयों के प्रधानाध्यापकों को नियंत्रित करते हैं, तो उनका वेतन उनसे कम नहीं होना चाहिए। उन्हें राजपत्रित अधिकारी का दर्जा भी दिया गया था।

राजपत्रित अधिकारी का दर्जा मिलने के बावजूद अब तक उनकी सेवा नियमावली नहीं बनी है। प्रदेश में खंड शिक्षा अधिकारियों के 1031 पद हैं जिनमें से लगभग दो सौ पद अभी खाली हैं। सेवा नियमावली न पाने के कारण शिक्षा विभाग खंड शिक्षा अधिकारियों की भर्ती के लिए लोक सेवा आयोग को अधियाचन नहीं भेज पा रहा है।

पिछली बार वर्ष 2006 में लोक सेवा आयोग ने स्क्रीनिंग टेस्ट के जरिये खंड शिक्षा अधिकारियों का चयन किया था। अब 4800 रुपये ग्रेड वेतन के साथ राजपत्रित अधिकारी होने पर उनका चयन पीसीएस परीक्षा के जरिये कराने का प्रस्ताव है। लिहाजा विभाग सेवा नियमावली को अंतिम रूप देने में जुटा है जिससे कि खाली पदों पर खंड शिक्षा अधिकारियों की भर्ती हो सके।

Monday, May 30, 2016

पूरा हुआ शिक्षामित्रों का सपना, आंकड़े गवाह हैं कि वास्कव में सरकार प्राथमिक शिक्षा के प्रति काफी संवेदनशील - सीएम अखिलेश

पूरा हुआ शिक्षामित्रों का सपना, आंकड़े गवाह हैं कि वास्कव में सरकार प्राथमिक शिक्षा के प्रति काफी संवेदनशील - सीएम अखिलेश

सहायता प्राप्त जूनियर हाईस्कूलों में की गयी नियुक्तियों की जनपदवार जाँच किये जाने के सम्बन्ध में आदेश-निर्देश जारी ।

सहायता प्राप्त जूनियर हाईस्कूलों में की गयी नियुक्तियों की जनपदवार जाँच किये जाने के सम्बन्ध में आदेश-निर्देश जारी ।

स्कूल बैग से बदलेगी सूरत : अखिलेश सरकार प्राथमिक व उच्च प्राथमिक स्कूल के छात्रों को देगी स्कूल बैग ।

स्कूल बैग से बदलेगी सूरत : अखिलेश सरकार प्राथमिक व उच्च प्राथमिक स्कूल के छात्रों को देगी स्कूल बैग ।

स्कूलों में एमडीएम की हकीकत देखेगी टीम : मिड डे मील न बनवाना शिक्षकों पर पड़ सकता है भारी

स्कूलों में एमडीएम की हकीकत देखेगी टीम : मिड डे मील न बनवाना शिक्षकों पर पड़ सकता है भारी

इलाहाबाद : मिड डे मील न बनवाना शिक्षकों पर भारी पड़ सकता है। सहायक शिक्षा निदेशक बेसिक ने स्कूलों में मिड डे मील की जांच के लिए छह सदस्यीय कमेटी गठित की है जो प्रतापगढ़, फतेहपुर, कौशांबी और इलाहाबाद जिले में भ्रमण कर मिड डे मील की हकीकत देखेगी। प्रतापगढ़, कौशांबी, फतेहपुर और इलाहाबाद समेत 55 जिलों को सूखा ग्रस्त घोषित किया गया है।

इन जिलों में संचालित सरकारी स्कूलों में छुट्टी में भी मिड डे मील बनवाने के निर्देश शासन ने दिए हैं। बावजूद, स्कूलों में एमडीएम नहीं बन पा रहा है। ग्रामीण अंचल से मिड डे मील नहीं बनने की शिकायत सहायक शिक्षा निदेशक बेसिक (एडी बेसिक) रमेश कुमार को प्राप्त हो रही है। ऐसे में योजना को संचालित कराने और उसकी हकीकत देखने के मद्देनजर एडी बेसिक ने छह सदस्यीय मंडलीय टीम गठित की है। जो उक्त जिलों में जाकर एमडीएम की पड़ताल करेगी और अपनी रिपोर्ट मंडलीय कार्यालय और जिलाधिकारी को सौंपेगी। इसकी साप्ताहिक समीक्षा भी होगी। मिड डे मील के मंडलीय समन्वयक सुनीत पांडेय ने बताया कि स्कूलों में टीम जाकर मिड डे मील की हकीकत देखेगी।

3500 सहायक अध्यापकों की भर्ती (उर्दू भाषा) चतुर्थ काउंसलिंग के उपरांत सचिव ने भरे हुए और रिक्त पदों का मांगा ब्यौरा ।

3500 सहायक अध्यापकों की भर्ती (उर्दू भाषा) चतुर्थ काउंसलिंग के उपरांत सचिव ने भरे हुए और रिक्त पदों का मांगा ब्यौरा ।

संशोधनों में फंसी शिक्षकों की तबादला नीति : ट्रान्सफर इस साल भी टलने के आसार

संशोधनों में फंसी शिक्षकों की तबादला नीति : ट्रान्सफर इस साल भी टलने के आसार

मन की बात : टीईटी की धांधली, कहने सुनने में भले यह एक नकारात्मक अभिव्यक्ति महसूस हो किंतु वास्तविकता इसी के इर्द-गिर्द सिमटी हुई........

मन की बात : टीईटी की धांधली, कहने सुनने में भले यह एक नकारात्मक अभिव्यक्ति महसूस हो किंतु वास्तविकता इसी के इर्द-गिर्द सिमटी हुई........

हर सरकारी सुविधा बिचौलियों और दलालों के लिए कमाई का अवसर है। कहने सुनने में भले यह एक नकारात्मक अभिव्यक्ति महसूस हो किंतु वास्तविकता इसी के इर्द-गिर्द सिमटी हुई है। माध्यमिक शिक्षा परिषद द्वारा कराई गई पहली शिक्षक पात्रता परीक्षा यानी टीईटी-2011 इसकी जीती-जागती मिसाल है। किसी सरकारी भर्ती प्रक्रिया में क्या क्या गड़बड़ियां हो सकती हैं, यह शोध करना हो तो टीईटी-2011 से बढ़िया संदर्भ सामग्री अन्यत्र नहीं मिलेगी।

72 हजार से अधिक बेसिक शिक्षकों की भर्ती प्रक्रिया में अब जब दो तिहाई पद भरे जा चुके हैं, एक तिहाई पदों के लिए योग्य उम्मीदवार नहीं मिल रहे, सैकड़ों अभ्यर्थी नियुक्ति के बाद बर्खास्त हो चुके हैं, तब मूल्यांकन करने वाली फर्म के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर विवेचना शुरू की गई है। वाइटनर प्रकरण के बाद शासन ने यह तो स्वीकार किया था कि उसके पास ओएमआर शीट मौजूद नहीं हैं लेकिन इस स्वीकारोक्ति के बाद खामोश हो गया।

शिक्षा का अधिकार अधिनियम लागू होने के बाद बड़ी संख्या में शिक्षक भर्ती के शोर के बीच उम्मीद की एक लहर उठी थी। हालांकि विज्ञापन निकलने के बाद से ही टीईटी और 72 हजार से अधिक रिक्तियों में भर्ती विवादों में घिर गई। अभ्यर्थियों को दो से तीन बार आवेदन करने के बाद मौका मिला। प्रक्रिया आगे बढ़ती कि ओएमआर शीट में वाइटनर के प्रयोग व अन्य धांधलियों के प्रकरण सामने आने लगे।

मामला कई बार हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट पहुंचा और तब से हर रोज कहीं न कहीं से इस भर्ती में गड़बड़ी की सूचना और शिकायत पर कार्यवाही के समाचार आ रहे हैं। कई बड़े अफसरों की गिरफ्तारी के बाद पुलिस सारे रिकॉर्ड जब्त कर चुकी है। ओएमआर शीट गायब होने का राज भी तभी खुला जब पिछले साल हाई कोर्ट ने बेसिक शिक्षा सचिव को वाइटनर प्रयोग करने वालों की सूची उपलब्ध कराने और जांच के निर्देश दिए।

पता चला कि परीक्षा आयोजित कराने वाले माध्यमिक शिक्षा परिषद के पास महज टीईटी-2011 के अंकपत्र की सीडी ही उपलब्ध है। मूल्यांकन करने वाली फर्म एसके प्रिंटेक डाटा क्रिएटिव सल्यूशन नई दिल्ली दिये गए पते पर मौजूद ही नहीं है। यानी, फर्जीवाड़ा भर्ती का विज्ञापन निकालने के साथ ही सुनिश्चित हो चुका था। जाहिर है इस स्तर के फर्जीवाड़े में बड़ी मछलियां शामिल रही होंगी जिन्हें पकड़ने के लिए जाल भी मजबूत बनाना होगा। शासन की मंशा साफ है तो इस प्रकरण की विवेचना विशेष कार्य बल अथवा केंद्रीय एजेंसी से करानी चाहिए।

     साभार : सम्पादकीय पृष्ठ दैनिकजाकरण

Sunday, May 29, 2016

शिक्षकों ने की मुख्यमंत्री आवास घेरने का ऐलान : अन्तर्जनपदीय शिक्षकोंं ने अपनी मांगों को लेकर पिछले दस दिन से कर रहे संघर्ष

शिक्षकों ने की मुख्यमंत्री आवास घेरने का ऐलान : अन्तर्जनपदीय शिक्षकोंं ने अपनी मांगों को लेकर पिछले दस दिन से कर रहे संघर्ष

मन की बात : शिक्षा की ऐसी उपेक्षा किसी अपराध से कम नहीं है तो आइये शिक्षा की ही चर्चा करते हैं, जब भारत सरकार को नीतियां बनानी थीं तो उसके सामने यूरोप, अमेरिका से लेकर जापान, कोरिया और चीन तक के उदाहरण थे लेकिन फिर भी हमारी नीतियों में शिक्षा को प्राथमिकता कभी नहीं मिल सकी, जो पीढ़ी पढ़ नहीं सकी थी उसके लिए 'साक्षरता मिशन' तो ठीक था लेकिन नई पीढ़ी के लिए..........

मन की बात : शिक्षा की ऐसी उपेक्षा किसी अपराध से कम नहीं है तो आइये शिक्षा की ही चर्चा करते हैं, जब भारत सरकार को नीतियां बनानी थीं तो उसके सामने यूरोप, अमेरिका से लेकर जापान, कोरिया और चीन तक के उदाहरण थे लेकिन फिर भी हमारी नीतियों में शिक्षा को प्राथमिकता कभी नहीं मिल सकी, जो पीढ़ी पढ़ नहीं सकी थी उसके लिए 'साक्षरता मिशन' तो ठीक था लेकिन नई पीढ़ी के लिए..........

सीबीएसई के परिणामों के बाद आई एक ख़बर थोड़ा चौंकाती है। थोड़ा सकून भी देती है।  ख़बर ये है कि दिल्ली के सरकारी स्कूलों ने निजी स्कूलों की तुलना में अच्छा प्रदर्शन किया है। ऐसा इसलिए है क्योंकि यह ख़बर उस अवधारणा को तोड़ती है जिसमें सरकारी का दूसरा नाम 'घटिया' हो गया है। अब साधारणतया लोग अपने बच्चों को सरकारी स्कूल में नहीं पढ़ाना चाहते। मेरे अपार्टमेंट के लिएकपड़े प्रेस करने का काम करने वाले परिवारों के बच्चे भी निजी स्कूल में पढ़ते हैं। हालांकि वे निजी स्कूल भी बहुत ख़राब हैं। लेकिन उन परिवारों को लगता है कि वे सरकारी से फिर भी अच्छे हैं। उनकी बात बहुत ग़लत भी नहीं है।

शिक्षा के इतने बुरे हाल...

उनकी बात स्वयंसेवी संस्था प्रथम की रिपोर्ट से भी साबित होती है। प्रथम की पिछली रिपोर्ट में कहा गया था कि सरकारी स्कूलों में आठवीं कक्षा में पढ़ने वाले एक चौथाई यानी 25 प्रतिशत बच्चे दूसरी कक्षा की किताबें तक ठीक से पढ़ नहीं पाते जबकि पांचवीं कक्षा के आधे बच्चे दूसरी कक्षा की किताब ठीक से नहीं पढ़ पाते। इस रिपोर्ट के अनुसार दूसरी कक्षा में पढ़ने वाले उन बच्चों का प्रतिशत साल दर साल बढ़ रहा है जो एक से नौ तक की संख्या तक नहीं पहचान पाते।

स्कूल शिक्षकों के सामान्य ज्ञान का स्तर

अलग-अलग लोगों की ओर से रिकॉर्ड किए गए वीडियो भी यूट्यूब पर उपलब्ध हैं जिसमें दिखता है कि सरकारी स्कूल के शिक्षक का भी सामान्य ज्ञान कितना ख़राब है। हालांकि यह कहना कठिन है कि निजी स्कूलों में शिक्षकों का स्तर कैसा है। ख़ासकर उन निजी स्कूलों का, जो छोटे शहरों और क़स्बों में खुल रहे हैं लेकिन जो तस्वीर सामने है वह सरकारी स्कूल के नाम से डर पैदा करती है। और यह डर अस्वाभाविक भी नहीं है। आख़िर ये उस भारत के बच्चे हैं जिस भारत के राजनेता जनता को आर्थिक महाशक्ति बनने का सपना बेच रहे हैं।

क्‍या कहते हैं नोबेल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन
नोबेल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन ने कुछ महीनों पहले इसी डर को रेखांकित किया था। लंदन स्कूल ऑफ़ इकॉनॉमिक्स की पत्रिका से बात करते हुए उन्होंने कहा था, "भारत दुनिया का अकेला ऐसा देश है जो अशिक्षित और अस्वस्थ कामगारों के साथ वैश्विक आर्थिक महाशक्ति बनने की कोशिश कर रहा है। ऐसा न पहले कभी ऐसा हुआ है और न ही भविष्य में ऐसा संभव होगा।" उनका तर्क है कि अगर यूरोप और अमेरिका ने सार्वभौमिक शिक्षा की ओर ध्यान देने का फ़ैसला किया तो इसकी एक ठोस वजह थी। अमर्त्य सेन ने शिक्षा को लेकर जापान, दक्षिण कोरिया, ताइवान, हांगकांग, सिंगापुर और चीन का भी उदाहरण दिया है।

आर्थिक विकास में अहम भूमिका है शिक्षा-स्वास्‍थ्य नीति की

अमर्त्य सेन उदाहरण देकर समझाते हैं कि सार्वभौमिक शिक्षा और स्वास्थ्य की नीति किस तरह से आर्थिक विकास में भूमिका निभाती है। वे बताते हैं कि 60 के दशक में केरल में वामपंथी सरकार ने जब शिक्षा और स्वास्थ्य पर पैसा खर्च करने का फ़ैसला किया तो उसका विरोध हुआ। लोगों ने कहा कि जो प्रदेश देश का तीसरे नंबर का ग़रीब प्रदेश है वह अपना पैसा शिक्षा और स्वास्थ्य पर क्यों खर्च कर रहा है। और जैसा कि अमर्त्य सेन कहते हैं, "आज केरल की प्रतिव्यक्ति आय देश में सबसे अधिक है।"

सर्वे बताता है देश के 41.5 करोड़ लोग स्कूल ही नहीं गए

तो इसके दो पहलू हैं- एक शिक्षा और दूसरा स्वास्थ्य। स्वास्थ्य पर चर्चा फिर कभी. फिलहाल शिक्षा की चर्चा करते हैं। जब भारत सरकार को नीतियां बनानी थीं तो उसके सामने यूरोप, अमेरिका से लेकर जापान, कोरिया और चीन तक के उदाहरण थे लेकिन फिर भी हमारी नीतियों में शिक्षा को प्राथमिकता कभी नहीं मिल सकी। जो पीढ़ी पढ़ नहीं सकी थी उसके लिए 'साक्षरता मिशन' तो ठीक था लेकिन नई पीढ़ी के लिए शिक्षा कोई मिशन ही नहीं बन पा रहा है। 'इंडिया स्पेंड' का जनगणना पर आधारित एक सर्वेक्षण कहता है कि भारत में अभी भी 41.5 करोड़ लोग ऐसे हैं जिन्होंने कभी किसी स्कूल का मुंह तक नहीं देखा। यह आबादी रूस की आबादी का तीन गुना है। 1988 में शुरू हुए साक्षरता मिशन के बाद का ये आंकड़ा बताता है कि हम साक्षरता मिशन तो चलाते रहे लेकिन शिक्षा की ओर कोई ध्यान नहीं दिया।

क्‍या शिक्षा को अधिकार बना देना ही पर्याप्त है?

पहली अप्रैल 2010 के बाद से अब शिक्षा हर नागरिक का अधिकार है यानी सरकार की ओर से हर किसी को प्राथमिक स्कूलों में दाखिला दिलाने की व्यवस्था की जाएगी। शिक्षा को अधिकार बना देने मात्र से क्या बात बन जाएगी? शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार किस तरह से आएगा? क्या लोग अपने बच्चे को उन्हीं स्कूलों में भेजेंगे जहां आठवीं में पहुंचकर भी बच्चा दूसरी कक्षा की किताबें नहीं पढ़ पाएगा? सच तो यह है कि हमारे स्कूल बच्चों को शिक्षित तो नहीं ही कर रहे, वे उन्हें ठीक तरह से साक्षर भी नहीं बना पा रहे हैं। वैसे हमारे कॉलेज भी कम नहीं हैं जहां मैकेनिकल इंजीनियरिंग का छात्र नहीं जानता कि टू स्ट्रोक इंजन से फ़ोर स्ट्रोक इंजन किस तरह से अलग होता है और भूगोल में एमए कर चुका छात्र नहीं जानता कि राजस्थान और पंजाब की सीमाएं आपस में मिलती हैं या नहीं।

आखिरकार किसी को जवाबदारी तो लेनी होगी

क्या यह पैसे का दुरुपयोग नहीं है कि कागज़ों पर आंकड़े भरे जाते रहें और स्लेटें खाली रहें? क्यों हम ऐसे स्कूल चला रहे हैं जहां खानापूर्ति के लिए कक्षाएं चल रही हैं और शिक्षकों को तनख़्वाह मिल रही है। क्यों इसकी जवाबदारी कोई नहीं ले रहा है? जिन प्रदेशों में ऐसे बच्चे मिलें जो अपनी कक्षा की किताबें न पढ़ सकें वहां तो थोक में बर्खास्तगी होनी चाहिए। शिक्षकों से लेकर आईएएस और शिक्षा मंत्री तक...।

शिक्षा को लेकर पिछले दो बजट के आंकड़े चिंताजनक

और ऐसे समय में, जब अमर्त्य सेन चिंता कर रहे हैं कि हमें अपने कामगारों को शिक्षित करना चाहिए, हमारी सरकार शिक्षा के बजट में कटौती कर रही है। वित्तमंत्री अरुण जेटली के पिछले दो बजट के आंकड़े चिंता पैदा करते हैं। शायद सरकारें चाहती है कि धीरे-धीरे शिक्षा को पूरी तरह से निजी हाथों में सौंप दिया जाए। इसीलिए पिछले तीन-चार दशकों में सरकारी शिक्षा व्यवस्था को लगातार कमज़ोर किया गया है। कम से कम गुणवत्ता के मामले में तो किया ही गया है।

अमेरिका का उदाहरण सामने है...

अमेरिका को निजीकरण का सबसे बड़ा हिमायती देश माना जाता है लेकिन सच यह है कि प्राथमिक शिक्षा का पूरा जिम्मा वहां सरकार उठाती है। यहां तक कि स्कूल तक लाने-ले जाने का भी। लेकिन हमारी सरकारें पता नहीं क्यों अपनी जनता के साथ ऐसा षडयंत्र कर रही हैं जो अपराध की तरह दिखता है..।

-विनोद वर्मा वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं।

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