MAN KI BAAT : न तो बच्चे स्कूल जाने को तैयार न सरकार खोलने को - घुमंतू बाबा की कलम से......

MAN KI BAAT : न तो बच्चे स्कूल जाने को तैयार न सरकार खोलने को - घुमंतू बाबा की कलम से......

बृजेश शुक्ल

उत्तर प्रदेश सरकार न तो अभी स्कूल उनका पालन हो पाएगा। प्राथमिक शिक्षक खोलने जा रही है और न ही अभिभावक संघ के अध्यक्ष सुरेश जायसवाल कहते बच्चे भेजने के लिए तैयार हैं। दोनों तरफ हैं कि शिक्षक जिम्मेदार हैं, लेकिन ना से ही जबानी जमा खर्च हो रहा है। सरकार कह रही है कि आगे विचार करेंगे स्कूल अभी स्कूल खोलने का वक्त आया है और ना ही अभिभावक इसके लिए तैयार खोलने के बारे में और अभिभावकों में से हैं। उन्हें नहीं लगता जुलाई में भी स्कूल तमाम बता रहे हैं कि वह तो अपने बच्चों खुलेंगे । स्कूल खुलने या न खुलने का को स्कूल नहीं भेजेंगे । वर्तमान हालात देखें ज्यादा असर ना तो सरकारी स्कूलों के तो अभी स्कूल खुलने के आसार नहीं। शिक्षकों का पड़ रहा है और ना ही बच्चों स्कूल खोलने को लेकर सरकार भी कोई पर। लेकिन स्ववित्तपोषित मान्यता प्राप्त जल्दबाजी में नहीं है। 


मलिहाबाद के रामआसरे कहते हैं कि सब कुछ हवाबाजी चल रही है। हमको लागत है स्कूल आबई न खुलिहै। अगर खुला है तो कोह के लरिका फालतू तो है नहीं जो कोऊ भेजि दई। सरकार कुछ भी दावा करे, लेकिन यह साफ हो चुका कि अगस्त में सरकार समीक्षा विद्यालयों के लगभग तीन लाख शिक्षक व कर्मचारी बर्बादी के कगार में पहुंच गए हैं। उससे बड़ा संकट निजी विद्यालयों के कर्मचारियों व शिक्षकों पर आया है। पहले से ही कम वेतन पाने वाले इन शिक्षकों की सुध कोई नहीं ले रहा करेगी कि स्कूल खोले जाएं या नहीं। यह है। इसीलिए निजी विद्यालयों के प्रबंधकों आशंका भी व्यक्त की जा रही है कि हो का दबाव है स्कूल जल्द खुले। अब स्कूल सकता है कि यदि स्थितियां सामान्य हुईं तो जल्द न खुलने की जो संभावनाएं बन रही स्कूल नवरात्र के बाद भी खुल सकते हैं। हैं, उससे यह वर्ग और भी परेशानी में ज्यादातर अभिभावक इस बात से डरे हुए फंसेगा माध्यमिक शिक्षक संघ के नेता हैं कि स्कूल जाने पर उनके बच्चे संक्रमित आरपी मिश्रा कहते हैं की स्ववित्तपोषित हो सकते हैं। वास्तव में गांव में यह डर विद्यालय के शिक्षक भुखमरी के कगार में कहीं ज्यादा है। तमाम लोगों से बात करने पहुंच चुके हैं। संघ के अध्यक्ष ओमप्रकाश के बाद यह साफ हो जाता है कि लोग शर्मा ने मुख्यमंत्री को कई बार पत्र लिखा अपने बच्चों को फिलहाल स्कूल नहीं और यह मांग की कि इन विद्यालयों के भेजने वाले। लखनऊ के निगोहां के बंसी शिक्षकों को भी आर्थिक सहायता दी जाए। मौर्य कहते हैं कि मोदी का सुना तेईयू। लेकिन इस पर अभी तक कोई निर्णय नहीं कहीं रहे रहै की जान है तो जहान है। हुआ है। भैया कौन जरूरत है बच्चे को स्कूल भेजा 

सीतापुर के अटरिया के सनेही यादव जाए। जब माहौल बिल्कुल ठीक हो जाए कहते हैं की यदि सरकारी विद्यालय नहीं तब हम अपने लड़के का स्कूल भेजब। खुलते हैं तो इसका कोई बड़ा फर्क नहीं जबकि सरकार के कई अधिकारी कहते पड़ने वाला। यह सवाल करते हैं कि आप हैं कि स्कूल खोलने ही कहां जा रहे हैं ही बताइए कि क्या फर्क पड़ जाएगा। जो अभी भेजने की बातें हो रही है | पिछले शिक्षकों को वेतन पहले की तरह मिल तमाम वर्षों में स्कूलों का दौरा कर चुका रहा है। बच्चे पहले ही स्कूल कम आते थे हूं, गांव की स्कूलों की व्यवस्था देखी और अब कुछ दिन बिल्कुल नहीं आ रहे उससे तो यही लगा कि जब तक कोरोना हैं। वह सवाल उठाते हैं कि सरकार ने 3 का एक-एक मामला ठीक ना हो जाए तब महीने की फीस न लेने का फरमान जारी तक स्कूल न खुलें तो ही अच्छा है। स्कूलों कर दिया है। यह अच्छा निर्णय है, लेकिन में यह रोज ही देखने को मिलता है कि जो सरकारी कोष से निश्चित वेतन ले रहे बच्चे लड़ते हुए गुत्थम गुथ हो जाते हैं। हैं ऐसे कौन से कारण हैं वह अपने बच्चों इसके साथ ही इस बात की भी कोई की फीस न दें। छूट तो गरीबों को मिलनी गारंटी नहीं है की सरकार स्कूल खोलने चाहिए थी, लेकिन इसका लाभ उठाया के लिए जो नियम बनाएगी सुदूर गांव में मोटी-मोटी तनख्वाह लेने वालों ने।

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