MAN KI BAAT : शिक्षा के तम्बू के तीन खम्बे होते हैं शिक्षक, अभिभावक और बच्चे, अगर इन तीनों में से किसी एक में भी थोड़ी कमी रह जाती है तो बच्चे की शिक्षा पर.......

MAN KI BAAT : शिक्षा के तम्बू के तीन खम्बे होते हैं शिक्षक, अभिभावक और बच्चे, अगर इन तीनों में से किसी एक में भी थोड़ी कमी रह जाती है तो बच्चे की शिक्षा पर.......

बात कुछ पुरानी है। कुछ दिनों से कक्षा में रोजाना 7-8 बच्चे अनुपस्थित रह रहे थे। ऐसा कभी-कभी ही होता था जब कक्षा में इतनी कम उपस्थिति रहती हो। मैंने बच्चों से जब इसका कारण पूछा तो उन्होंने बताया कि आजकल शादियों का सीजन चल रहा है, शायद बच्चे शादियों में गए होंगे। एक बच्चा पिछले तीन दिनों से अनुपस्थित था तो मैंने उसके बारे में पूछा कि ये इतने दिनों से स्कूल क्यों नहीं आ रहा है ? एक बच्चा बोला कि उसके बड़े भाई की शादी है आज। मैंने अनुपस्थित बच्चे के Best Friend से मजाक के लहजे में कहा कि, “आज तो माल-मिठाइयों में हाथ रहेगा तेरा।”

उस बच्चे ने कहा “सर हम नहीं जाते उनके घर ।”

मैंने पूछा क्यों, “तुझे नहीं बुलाया क्या उसने ? ”

तो वो बोला कि, “बुलाया तो है सर, बाकी सब व्यवहार तो ठीक है लेकिन हम उनके घर जीमने नहीं जाते हैं।”

मैंने पूछा, “ये क्या बात हुई भाई? यहाँ तो तुम एक-दूसरे की थाली में खाते हो। घर जाने में क्या परेशानी है?”

उसने बताया कि मेरे घर वालों ने साफ-साफ मना कर दिया है। आज की पाठ योजना को किनारे करके मैंने इसी विषय पर बात करने की ठानी। चर्चा में पता चला कि हम स्कूल में इतनी मेहनत करके जिस भेदभाव को खत्‍म करने का प्रयास करते हैं, समाज उसी भेदभाव की ज्वाला में घी डालने का काम करता है। ये तो मात्र एक उदाहरण है। ऐसे कई उदाहरण हमें आस-पास रोजाना देखने को मिलते हैं। एक शिक्षक और सुयोग्य नागरिक होने के नाते हमारा यह दायित्व बनता हैं कि हम सब मिलकर इस खाई को भरकर समाज में व्याप्त भेदभाव को मिटाने का पुरजोर प्रयास करें।

किसी राष्ट्र के नागरिकों की गुणवत्ता उसके नागरिकों की गुणवत्ता पर निर्भर करती है तथा नागरिकों की गुणवत्ता काफी हद तक उनकी शिक्षा पर निर्भर करती है। एक अच्छे और विकसित समाज की संकल्पना उसके शिक्षित वर्ग के बिना असम्भव है। यहाँ शिक्षित से मतलब केवल मात्र डिग्रियों से नहीं है बल्कि व्यवहारगत परिवर्तन से है। शिक्षा की त्रिआयामी प्रक्रिया में विद्यालय, विद्यार्थी और समाज तीनों की समान भूमिका है। बच्चे जितना समय विद्यालय में बिताते हैं उससे लगभग दुगुना-तिगुना समय अपने परिवेश (समाज) में व्यतीत करते हैं। बच्चे दोनों परिवेश में ही औपचारिक व अनौपचारिक रूप से अनवरत सीखते रहते हैं। यह सीखना अवलोकन, अनुभव, क्रिया आदि द्वारा निरन्तर जारी रहता है।

विद्यालय बच्चों में दूसरे के सापेक्ष खुद के अस्तित्व की समझ को विकसित करता है। विद्यालय में औपचारिक शिक्षण बच्चों को समाज के बेहतर निर्माण के लिए प्रेरित करता है और तैयार भी करता है। वहीं समाज में अनौपचारिक रूप से सीखते हुए बच्चे “तेरा तुझको अर्पण” वाली अवधारणा पर काम करते हैं। वे समाज में अनुभव और अवलोकन के द्वारा सीख कर समाज को वैसा ही देने का प्रयास करते हैं। समाज भी अपनी अपेक्षाओं को बच्चों में हस्तांतरित करने का पुरजोर प्रयास करता है। इस प्रकार चाहे-अनचाहे विद्यालय और समाज दोनों ही बच्चे में अपने विचार व अपेक्षाएँ थोपने का काम करते हैं।

संविधान में शिक्षा के मूल अधिकार और नीति निर्देशक तत्वों की जो बात की गई थी तब उसके जेहन में यही था कि हर बच्चा स्कूल तक पहुँचेगा और उसे समान शिक्षा मिलेगी। जिस शिक्षा के जरिए हम आजादी के बाद संविधान में प्रदत्त समानता की तरफ बढ़ रहे थे आज वही शिक्षा समाज में असमानता पैदा कर रही है। वर्तमान शिक्षा प्रणाली और शिक्षा की औपचारिक संस्थाएँ विद्यालय एक ऐसे समाज बनाने का काम कर रही हैं जो सब कुछ हो सकता है किन्‍तु समान नहीं। विद्यालय और समाज बच्चे में शुरू से ही भेदभाव का ऐसा बीज बो देते हैं जो धीरे-धीरे समय के साथ दरख्‍त बन जाता है। जब विद्यालय और समाज दोनों का लक्ष्य यही कि हर बच्चा जागरूक और सुयोग्य नागरिक बने तो हमें उन कारणों की ओर ध्यान देने की जरूरत है जो इस लक्ष्य की प्राप्ति में बाधक बनते हैं।

      आइए हम उन कारणों को पहचानने का प्रयास करते हैं जो इनमें भेदभाव का बीज बोने और उसे पोषित करने का काम करते हैं :-

विद्यालय की भूमिका  

■प्रार्थना सभा में लड़के और लड़कियों की अलग-अलग पंक्तियाँ

■खेल के दौरान टीम का विभाजन (लड़के-लड़कियाँ, कच्चे-पक्के खिलाड़ी, छोटे-बड़े खिलाड़ी आदि)
■शिक्षक का कक्षा-कक्षा व्यवहार (पढ़ाते समय, और तो और दण्ड देते समय भी भेदभाव)
■शिक्षक का पूर्वाग्रह (लड़कियाँ शारीरिक रूप से कमजोर होती हैं, विशेष जाति वर्ग के बच्चे विषय विशेष में अच्छे होते हैं, लड़कियाँ गणित में कमजोर होती हैं)
■कक्षा में दो मॉनिटर नियुक्त करना (एक लड़का और एक लड़की)
■कक्षा की सफाई व विद्यालय की व्यवस्था सम्‍बन्धित अन्य कार्य (जैसे-फर्नीचर की व्यवस्था लड़के और चॉक-डस्टर का ध्यान रखने का काम लड़कियाँ )
■विद्यालय की गतिविधियों में चयन का तरीका (भाषण, वाद-विवाद में लड़के तथा रंगोली बनाने, साज-सज्जा, नृत्य व गायन में लड़कियाँ)
■पाठ्यपुस्तक में चित्रों, घटनाओं, कहानियों के द्वारा लैंगिक, सामाजिक भेद को दिखाया जाना (कुछ वर्गों में महिलाओं को उनकी परम्परागत भूमिका के रूप में दिखाया जाना)
■विषयों का विभाजन (सिलाई-कढ़ाई, होम साइंस, B.Ed., ब्यूटी पार्लर कोर्स आदि लड़कियाँ और कंप्यूटर शिक्षा, इंजीनियरिंग, टाइपिंग, B.P.Ed., आदि लड़कों का विषय)
■कक्षा में बच्चों को उनके नाम की बजाय उपनाम से सम्बोधित करना आदि ।
समाज और परिवेश की भूमिका  

◆सह शिक्षा के प्रति नकारात्मक दृष्टिकोण

◆अशिक्षित माता-पिता
◆लड़कों को लड़कियों की अपेक्षा अधिक महत्व
◆लड़कियों को घर के काम और लड़कों को उच्च शिक्षा हेतु प्रेरित करना
◆समाज में काम का विभाजन लिंग, जाति, वर्ग के अनुसार
◆आर्थिक, जातिगत, सांस्कृतिक, लैंगिक, भाषाई, रंगभेद आदि प्रकार के भेदभाव
◆परिवार और समाज में लिए गए फैसलों में महिलाओं और बच्चों को शामिल नहीं किया जाना
◆कुछ सामाजिक संस्थाएँ जैसे पंचायत, खाप पंचायत का संगठन और सामुदायिक फैसलों में एक विशेष वर्ग का वर्चस्व
◆छुआछूत, जाति व्यवस्था, बाल विवाह, भ्रूण हत्या आदि कुप्रथाएँ व रीति-रिवाज आदि ।
उपरोक्त उदाहरणों के द्वारा यह समझा जा सकता है कि हम चाहे-अनचाहे बच्चों में प्रारम्भ से ही भेदभाव का बीज बो देते हैं। यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि हमें यह समझना जरूरी है कि असमानता व भेदभाव में बहुत बड़ा अन्तर है जो एक महीन सी लकीर द्वारा अलग होता है। हमें पता भी नहीं चलता कि हम कब इस लकीर को पार कर जाते हैं।

अज़ीम प्रेमजी स्कूल में काम करते हुए मुझे 7 वर्ष हो गए हैं और मैं इस बात को दृढ़ता से कह सकता हूँ कि प्रारम्भ से ही हमारा पूरा विद्यालय परिवार इस भेदभाव को पनपने का मौका ही नहीं देते हैं। हमारे विद्यालय में हम विशेष रूप से ध्यान देकर शुरुआत से ही इन विषयों को शिक्षण प्रक्रिया में केंद्र में रखते आए हैं। कक्षा-कक्ष में और कक्षा के बाहर भी हम सचेत रहकर इन संवेदनशील सामाजिक विषयों पर लगातार काम करते हैं फिर चाहे वह असेंबली हो, खेल का मैदान हो या किसी भी विषय का कालांश। सामाजिक विज्ञान विषय के शिक्षक होने के नाते हमारी जिम्मेदारी ऐसे सामाजिक विषयों के सम्‍बन्‍ध में और अधिक हो जाती है। हम इस तरह के विषयों को पहचान कर इनके बारे में लगातार अपनी योजना से जोड़कर काम करते हैं। सामाजिक विज्ञान शिक्षक होने के नाते मुझे लगता है कि कक्षा 1 से 8 तक कोई भी टॉपिक ऐसा नहीं है जिसे बच्चों के परिवेश से जोड़कर नहीं पढ़ाया जा सकता है। उपलब्ध संसाधनों और परिवेश से जोड़कर विषय शिक्षण का यह काम काफी हद तक प्रभावी रहता है।

जब बात समानता-असमानता की की जा रही हो तो अधिकारों की ओर ध्यानाकर्षण लाजमी है। विशेष रूप से कक्षा शिक्षण की बात होने पर बाल अधिकारों को बिना समझे समानता-असमानता को नहीं समझा जा सकता है। जब हम बाल अधिकारों को समझने का प्रयास करते हैं तो हमें पता चलता है कि हमारा संविधान बच्चों के मानव अधिकारों को अहमियत देता है और उनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी राज्य पर डाली गई है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 15(3) राज्य को बच्चों की हितरक्षा के लिए विशेष प्रावधान बनाने का अधिकार देता है। इसके अलावा संविधान में बच्चों के अधिकारों को सुनिश्चित करने के लिए राज्य को कुछ निर्देश भी दिए गए हैं। अनुच्छेद 39(च) में कहा गया है कि हर बच्चे को स्वतंत्र और समग्र विकास के लिए सामान अवसर और सुविधाएँ राज्य द्वारा मुहैय्या करायी जाएगी। चाहे परिवार हो, स्कूल हो या सरकार, तीनों को ही बच्चों के सम्पूर्ण हित को ध्यान में रखते हुए और उनके अधिकारों का सम्मान करते हुए उनको पर्याप्त अवसर प्रदान करने चाहिए।

ऐसे ही प्रयासों में से एक अज़ीम प्रेमजी स्कूल में कक्षा छह में “लोकतंत्र और सरकार” विषय पर काम करते हुए मैंने योजना बनाई कि क्यों ना बच्चे स्वयं इस प्रक्रिया को करके (अनुभव द्वारा) सीखें। इसी क्रम में विद्यालय में पिछले दो वर्षों से“आपणी संसद” का गठन किया जा रहा है। यह आपणी संसद, बाल संसद का ही एक रूप है जिसमें बच्चे स्वयं पूरी प्रक्रिया से जुड़कर लोकतंत्र में सरकार के गठन, चुनाव प्रक्रिया और कार्य प्रणाली को समझते हैं।

पिछले सत्र में आपणी संसद की त्रैमासिक होने वाली बैठकों में बच्चों और उनके परिवेश से जुड़े विषयों पर योजनाबद्ध रूप से विस्तृत काम किया गया। पिछले सत्र में हुई तीन बैठकों में हमनेयातायात जागरूकता, साम्प्रदायिकता और बाल अधिकार विषयों को चिन्हित कर उन पर कार्य किया। यहाँ मैं बाल अधिकारों के विषय में हुई चर्चा के बारे में बताना चाहूँगा जिसके अन्तर्गत हमने कक्षा 6 में काम करते हुए अधिकार का अर्थ, अधिकारों की आवश्यकता, अधिकारों का महत्व, हमारे बाल अधिकार, समाज में व्याप्त समानता और असमानता विषयों पर फोकस करते हुए काम किया। बाल अधिकारों पर हुई इस चर्चा में हमने स्थानीय प्रशासन की मदद लेते हुए काम किया। जिला न्यायालय टोंक के न्यायाधीश से जब इस बारे में बात की गई तो वो रूचि के साथ बच्चों से बात करने के लिए तैयार हो गईं। उनके साथ योजना साझा करने के बाद निर्धारित दिन को वे अपने साथ दो अन्य न्यायिक अधिकारियों के साथ उपस्थित हुईं। उन्होंने विषय से जुड़े बच्चों के सवालों का धैर्य के साथ विस्तार से उत्तर दिया। समुदाय से भी अभिभावक इस चर्चा में शामिल हुए और सक्रिय भूमिका निभाई।

यह केवल एक उदाहरण है विद्यालय में बच्चों के साथ कार्य करने के ऐसे अन्य तरीके भी हो सकते हैं। मुझे लगता है कि अगर विद्यालय में व्यवस्थित रूप से काम किया जाए और छोटी-छोटी बातों पर ध्यान दिया जाए तो समाज में व्याप्त इस भेदभाव की खाई को भरा जा सकता है।

दरअसल, शिक्षा के तम्बू के तीन खम्बे होते हैं शिक्षक, अभिभावक और बच्चे। अगर इन तीनों में से किसी एक में भी थोड़ी कमी रह जाती है तो बच्चे की शिक्षा पर असर पड़ता है।  इन तीनों में सबसे महत्वपूर्ण होती है एक शिक्षक की भूमिका।  क्योंकि एक शिक्षक योजनाबद्ध तरीके से बच्चों को अवसर देता है और शिक्षित करने में भूमिका अदा करता है। बतौर सामाजिक विज्ञान विषय शिक्षक ज़िम्मेदारी अधिक बढ़ जाती है। क्योंकि सामाजिक विज्ञान विषय के लिए स्वयं बच्चों के अनुभव और समाज प्रयोगशाला की तरह होता है। इसलिए जरूरी है कि शिक्षक इस प्रयोगशाला का फायदा उठाकर योजनाबद्ध तरीके से बच्चे के सीखने-सिखाने में मदद करे।

   आभार/साभार : कुलदीप शर्मा, अज़ीम प्रेमजी स्‍कूल, टोंक, राजस्‍थान एवं Teachersofindia

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