पंचायत चुनाव से सरकारी स्कूलों में पढ़ाई बेपटरी : महज 90 दिन की क्लास के बाद इम्तिहान देंगे छात्र, कम से कम 240 दिन पढ़ाई का है नियम
लखनऊ। सरकारी स्कूलों में पढ़ाई-लिखाई पंचायत चुनाव से एकदम से बेपटरी हो गई है। शिक्षकों की चुनाव में ड्यूटी और मतदान के लिए स्कूलों की बिल्डिंग लिए जाने से चालू सत्र में कक्षाएं बुरी तरह से प्रभावित रही हैं। आलम यह है कि पूरे सत्र में विद्यार्थियों को पढ़ाई के लिए बमुश्किल 90 दिन मिलेंगे, जबकि नियम 240 दिन पढ़ाई के बाद ही इम्तिहान लेने का है।
शासन ने इस बार शैक्षणिक सत्र एक अप्रैल से शुरू करने का फैसला किया, लेकिन अप्रैल और मई में ज्यादा दाखिले ही नहीं हुए। रिकॉर्ड बताता है कि 90 फीसदी दाखिले जुलाई-अगस्त में ही हुए। यानी, गर्मियों की छुट्टियों को निकाल दें तो शुरुआती चार महीने प्रवेश प्रक्रिया में ही निकल गए। उसके बाद 21 सितंबर को जिला पंचायत और क्षेत्र पंचायत सदस्यों के चुनाव के लिए अधिसूचना जारी हो गई। यह चुनाव निपटा तो 7 नवंबर को ग्राम प्रधान और ग्राम पंचायत सदस्यों के चुनाव के लिए अधिसूचना जारी हो गई। इन पदों के लिए मतगणना 12 दिसंबर को होगी।
इन चुनावों में बड़े पैमाने पर बेसिक और माध्यमिक विद्यालयों के शिक्षकों की ड्यूटी लगाई गई। हर बार के चुनाव में मतदान से पहले शिक्षकों को दो दिन की ट्रेनिंग दी जाती है। मतदान के एक दिन पहले उन्हें पोलिंग बूथ पर पहुंचना होता है और मतदान के अगले दिन भी वे स्कूल नहीं जा पाते। फिर मतगणना से पहले भी दो दिन की ट्रेनिंग दी जाती और मतगणना में लगे होने के कारण भी वे दो दिन स्कूल नहीं जा पाते।
इसके अलावा मतदान के लिए तमाम स्कूलों की बिल्डिंग तीन दिन पहले जिला प्रशासन अधिगृहीत कर लेता है। मतदान के दो दिन बाद भी वहां पढ़ाई शुरू नहीं हो पाती। इस तरह से एक बार के चुनाव में कम से कम 12 दिन पढ़ाई ठप रहती है। यानी, 21 सितंबर से 12 दिसंबर के बीच कुल 24 दिन चुनाव के कारण पढ़ाई नहीं होगी।
दिसंबर में स्कूलों में कक्षा-10 और 12 के विद्यार्थियों के प्रैक्टिकल एग्जाम शुरू हो जाएंगे। एक फरवरी से बोर्ड परीक्षाएं होनी हैं। इन परीक्षाओं के लिए 21 दिन की प्रिपरेशन लीव देने का नियम भी है। फिर अन्य सार्वजनिक छुट्टियां भी हैं। शिक्षकों का कहना है कि इन सब वजहों से पूरे सत्र में छात्रों को क्लास में पढ़ाई के लिए बमुश्किल 90 दिन ही मिले हैं। जाहिर है इतने कम समय में उनका कोर्स पूरा होने से रहा। उन स्कूलों का हाल तो और भी खराब है, जिनकी बिल्डिंग मतगणना के लिए अधिगृहीत की गई हैं।
इस काम के लिए पूरे एक महीने के लिए बिल्डिंग अधिगृहीत कर ली जाती है। हालांकि, नियम है कि बिल्डिंग के एक हिस्से में प्रधानाचार्य पढ़ाई करवा सकते हैं। लेकिन, सभी शिक्षक संघों के पदाधिकारियों का कहना है कि व्यावहारिक तौर पर यह संभव नहीं हो पाता। पूरे एक महीने उन स्कूलों में पढ़ाई ठप रहती है।
ऐसा पहली बार नहीं चुनाव का कार्य जरूरी व अपरिहार्य होता है। शासन के निर्देशों के अनुसार इसकी ड्यूटी शिक्षकों को करनी पड़ती है। ऐसा पहली बार नहीं हो रहा है। जितने दिन ड्यूटी होती है, उतने दिन वे स्कूलों में नहीं आते हैं, लेकिन जहां तक कोर्स की बात है तो शिक्षक इसे पूरा कराते हैं। चुनाव से हो रहे नुकसान की भरपाई के लिए अलग से कोई व्यवस्था नहीं की गई है।
- दिनेश बाबू शर्मा, निदेशक, बेसिक शिक्षा
चुनाव संपन्न कराना हम सबका दायित्व
पूरी स्थिति की जानकारी शासन को दे दी गई थी। चुनाव संपन्न कराना हम सबका दायित्व है। इससे ज्यादा मैं कुछ नहीं कह सकता।
-अमरनाथ वर्मा, माध्यमिक शिक्षा निदेशक
अफसरों-नेताओं के बच्चे पढ़ते तो ऐसा न होता
अधिकारियों और नेताओं के बच्चे सरकारी स्कूलों में नहीं पढ़ते। जहां वे पढ़ते हैं, वहां के न तो शिक्षकों की चुनाव में ड्यूटी लगती है और न ही इस काम के लिए उनकी बिल्डिंग ली जाती है। नतीजतन, वे गरीब बच्चों के अभिभावकों का पढ़ाई को लेकर दर्द भी नहीं समझ पाते। पढ़ाई के पीक टाइम में चुनाव नहीं कराए जाने चाहिए थे। इसके लिए मई-जून का समय उपयुक्त था।
-जेपी मिश्रा, अध्यक्ष, प्रधानाचार्य परिषद
चुनाव ड्यूटी से तनाव में आ जाते हैं शिक्षक
हमारी राज्य कार्यकारिणी की बैठक में यह प्रस्ताव भी पास किया गया है कि चुनाव में अंतिम विकल्प के तौर पर शिक्षकों की ड्यूटी लगाई जाए। जिन शिक्षकों की चुनाव में ड्यूटी लगती है, वे इतने तनाव में आ जाते हैं कि ड्यूटी से पहले भी कई दिन पढ़ा नहीं पाते। इससे विद्यार्थियों का भविष्य खराब होता है। जहां ड्यूटी लगाई जाती है, वहां मच्छर तक भगाने के कोई प्रबंध नहीं होते। नतीजतन ड्यूटी करने वाले शिक्षक बीमार पड़ जाते हैं और उन्हें कई दिनों की छुट्टी लेनी पड़ती है।
-आरपी मिश्रा, प्रांतीय मंत्री, माध्यमिक शिक्षक संघ (शर्मा गुट)
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