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"गुरु उत्सव" बनाम शिक्षक दिवस -

"गुरु उत्सव" बनाम शिक्षक दिवस : कटाक्ष

बहस करने वालों को तो बहस करने का बहाना चाहिए। बताइए, अब गुरु उत्सव पर ही बहस खड़ी कर दी। हमसे लिखाकर ले लीजिए, उत्सव नहीं होता तो यही बहसिए इसकी शिकायत कर रहे होते कि शिक्षक-विक्षक को इस जमाने में पूछता ही कौन है? बेचारे कहीं तदर्थ तो कहीं संविदा और कहीं सिर्फ आपात टपके पैरा शिक्षक कहलाते हैं और पूरी तनख्वाह मांगने पर आए दिन पुलिस की लाठियां खाते हैं। प्रबंधकों वगैरह की गालियां खाते हैं, सो ऊपर से। बस साल में एक दिन याद किया जाता था, टीर्चस डे यानी शिक्षक दिवस पर। वह भी भुला दिया। लेकिन, अब उत्सव मनवा रहे हैं तो बंदे इस पर बहस कर रहे हैं कि गुरु उत्सव ही क्यों? कुछ और क्यों नहीं? पहले वाले टीर्चस डे उर्फ शिक्षक दिवस में ही क्या बुराई थी, उसी को रहने देते। अच्छा-भला तो काम चल रहा था। सच पूछिए तो देश इसी से मात खा जाता है। इस अच्छा- भला चल रहा था वाले रवैये की ही वजह से। बेचारी सरकार कुछ भी बदलने चले, यही ‘चल तो रहा था’ वाला रवैया बीच में आ जाता है। खैर अब तक चल रहा था तो चल रहा था। स्वतंत्रता के बाद से अब तक किसी तरह रो-पीटकर चल ही रहा था। पर अब और नहीं। अब ‘चल रहा था’ नहीं चलेगा। अब ‘दौड़ रहा था’ चाहिए। इससे कम नयी सरकार को मंजूर नहीं है। देश को चलाना नहीं, दौड़ाना जो है। आखिर, सरकार बदली है तो देश की चाल भी तो बदले। पर भाई लोग बदलने दें तब तो। यहां तो नाम बदलने पर ही हुज्जत हो रही है। वैसे दर्शन बघारेंगे कि नाम में क्या धरा है, किसी भी नाम से पुकारो, गुलाब तो गुलाब ही रहेगा। पर जरा गुलाब का संस्कृत वाला नाम लेकर देखिए, फिर देखिए कैसे तमिलवालों के साथ-साथ सैकुलरवालों को भी मिर्चे लगती हैं। बेचारी शिक्षा मंत्री को खुद टीवी पर सफाई देनी पड़ी कि नामांतरण नहीं किया जा रहा है। बस टीर्चस डे पर गुरु उत्सव होगा। सरकार ने कहा कि नामांतरण नहीं, तो भाई लोग शिक्षक दिवस के रूपांतरण का मुद्दा लेकर बैठ गए। हद तो यह है कि घुमा-फिराकर टीर्चस डे पर पीएम जी के बच्चों को भाषण देने पर ही विवाद खड़ा किया जा रहा है। कहने वाले तो यह भी कह रहे हैं कि कम से कम एक शिक्षक दिवस तो शिक्षकों के लिए छोड़ देते। उसे भी पीएम भाषण दिवस क्यों बनाया जा रहा है? यह शिक्षा के पवित्र मंदिर में राजनीति घुसाना है। पीएम सारे देश का होता है, शिक्षकों का भी। शिक्षक दिवस पर पीएम को सुनना तो सर्वोच्च स्तर पर शिक्षक दिवस मनाना है। वैसे भी गुरु, शिष्य के बिना अधूरा है। शिक्षक दिवस, गुरुओं का ही नहीं, शिष्यों का दिवस भी है। वर्तमान शिष्यों का भी और पूर्व-शिष्यों का भी। सच पूछिए तो शिष्यत्व तो चिरंतन है, छात्रत्व थोड़े ही है कि उसमें भूत या वर्तमान हो। पीएम जी भी शिक्षक न सही, शिष्य तो रहे ही हैं। क्या उन्हें देशभर के गुरुओं और शिष्यों के साथ शिक्षक दिवस मनाने का भी अधिकार नहीं है? पर बहसिए तो हुज्जत पर उतर आए हैं। कह रहे हैं कि पहले यह साफ होना चाहिए कि यह दिवस किस का है-शिक्षकों का या पीएम जी का! शिक्षक दिवस पर भी छात्र-शिक्षक सब को पीएम जी की ही सुननी है, तो इसे शिक्षक दिवस भी क्यों कहना? नाम बदल कर एक और पीएम दिवस ही क्यों नहीं कर देते? यह तो एक तरह से यही एलान करना हुआ कि सब दिन पीएम के!

कम से कम शिक्षकों का एक दिन तो छोड़ देते। लेकिन, इस तरह की बात करना डेमोक्रेसी का अपमान है। डेमोक्रेसी में सब वोट से तय होता है। असली शिक्षक भी। चुना हुआ पीएम सिर्फ पीएम नहीं होता है, वह शिक्षकों का शिक्षक होता है। पिछली बार वाले पीएम जी कभी शिक्षक रहे थे, सो शिक्षकपने में ही अटके रहे और कभी शिक्षक दिवस पर शिक्षकों को शिक्षा नहीं दे पाए। पर इस बार ऐसी कोई बाधा नहीं है। शिक्षक दिवस पर वैसे भी छात्र ही शिक्षक बनकर दिखाते हैं। इस बार पीएम जी की कक्षा सही। रही बात टाइमिंग, अनुशासन, इंतजाम वगैरह की, तो नियम तो यह है कि प्यासा शिष्य ही कुंआ नाम के गुरु के पास आता है। पर यहां चाहे डिजिटल रूप में ही सही, गुरु खुद चलकर शिष्यों के पास पहुंच रहा है। इसके बाद भी छोटी-मोटी शिकायतें, यह तो खेल भावना नहीं है भाई!

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