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MAN KI BAAT : गणित, भाषा-विकास व मूल्य कक्षा में इनको कैसे जोड़ा जाए?

MAN KI BAAT : गणित, भाषा-विकास व मूल्य कक्षा में इनको कैसे जोड़ा जाए?


उत्तर है - कहानी सुनाकर! और इस लेख का उद्देश्य यह दिखाना है कि कैसे कहानी के माध्यम से प्राथमिक शाला में गणित के मापन के विषयों को सार्थक और प्रासंगिक बनाया जा सकता है।

पिछले तीन सालों से गुड़गाँव के इण्डस वर्ल्ड स्कूल के शिक्षक और बच्चों के साथ काम करने का मौका मिलता रहा है। हर साल ‘कहानी सत्र’ से अलग-अलग अपेक्षाएँ होती हैं। 2015-16 में निर्देश था कि पाठ्यपुस्तकों की कहानियों को कथनीय और रोचक बनाया जाए। इसके लिए मुझे कहानी सत्र की योजना बनाने की पूरी छूट दी गई थी - जरूरत पड़ने पर कहानियों के संशोधन से लेकर हर कहानी के लिए उचित तकनीक के चयन तक, और साथ में कहानी से जो गतिविधियाँ निकलती हैं, उनको संचालित करना।

ग्रेड-3 की अँग्रेजी की किताब में एक कहानी थी ‘ए पाउण्ड ऑफ बटर’। मूल कहानी निम्नलिखित है --

एक किसान था, वह रोज एक पाउण्ड (आधा किलो से कुछ कम) मक्खन एक बेकर को बेचता था। एक दिन बेकर ने तय किया कि वह मक्खन तौलकर देखेगा कि उसको एक पाउण्ड मक्खन मिल रहा है या नहीं। उसने पाया कि उसे एक पाउण्ड मक्खन नहीं मिल रहा है। बेकर को इस बात पर बहुत गुस्सा आया और वह किसान को अदालत ले गया।

वहाँ पर जज ने किसान से पूछा कि क्या वह कोई पैमाना इस्तेमाल करता है? किसान ने उत्तर दिया, “महानुभाव, मैं एक साधारण इन्सान हूँ और मेरे पास बहुत सही नाप-तौल तो नहीं है लेकिन एक तराजू जरूर है।” जज ने किसान से पूछा, “फिर तुमने मक्खन को कैसे तौला?” तो किसान ने जवाब दिया, “श्रीमान, बेकर द्वारा मुझ से मक्खन खरीदने के काफी समय पहले से मैं बेकर से एक पाउण्ड ब्रेड खरीदता आ रहा हूँ। बेकर रोज जो ब्रेड लाता था, मैं उसको तराजू में रखकर उतने ही वजन का मक्खन देता हूँ। इसीलिए अगर इसमें किसी की गलती है तो वह इस बेकर की है।”

कहानी को विस्तार देने के लिए उसमें ये सब पहलू जोड़े गए - किरदारों व परिस्थितियों के वर्णन, किसान और बेकर के बीच बढ़ती दोस्ती, बेकर को यह समझ में आना कि किसान को जितना कहा था उससे कम मक्खन दे रहा है, और अन्तत: यह पता चल गया कि गलती किसकी है। अन्त में यह जोड़कर मूल कहानी को और आगे बढ़ाया -- ‘जज किसान से बोला कि वह तय करे कि बेकर उसे मुआवजा क्या दे और किसान ने बाटों की माँग की’।

यद्यपि यह कहानी ‘ईमानदारी के मूल्य’ और ‘जैसी करनी वैसी भरनी’ जैसे उपदेशों के उदाहरण हैं, कथानक नाप-तौल की मात्रा के आसपास घूमता है। और ऐसे अँग्रेजी और गणित को एकीकृत करके कहानी सुनाने के बाद, मेरे मन में एक गतिविधि का विचार आया।

तो मैंने इस गतिविधि में खाने की चीजें बनाने वाली कम्पनियों की ईमानदारी का गणितीय ज्ञान के इस्तेमाल से सत्यापन करने की  योजना बनाई। इसके लिए मुझे कहानी सत्र के दिन से पहले कुछ संसाधनों को इकट्ठा करना था - रसोई में इस्तेमाल होने वाला तराजू और अलग-अलग कम्पनियों/ब्राण्ड के खाद्य उत्पाद।

सत्र के दिन आवाज में उतार-चढ़ाव व ठहराव के उचित उपयोग के साथ उपरोक्त कहानी को बयान किया गया। क्योंकि मैंने किसान और बेकर को दोस्त बताया था इसलिए कुछ-एक बच्चे या तो हतोत्साहित हुए या फिर उन्हें गुस्सा आया, जब उन्हें समझ में आया कि बेकर ने किस तरह किसान के साथ अन्याय किया। कहानी पर चर्चा करने के बाद बच्चों को दो वर्गों में विभाजित कर, हर एक को टेबिल पर रखे सामान से एक-एक पैकेट चुनने को कहा गया। फिर बच्चों को पैकेट पर दी गई जानकारी को पढ़कर प्रमुख बातें लिखने के लिए कहा गया। उन्होंने जानकारियाँ पढ़ने में बेहद रुचि दिखाई और पैकेट पर दी गई जानकारी की  मात्रा से  काफी आश्चर्यचकित हुए।

तत्पश्चात् विद्यार्थियों ने खाद्य सामग्री के पैकेट पर दी गई मात्रा को लिख लिया और एक प्रश्नावली में भी नोट कर लिया। इसके बाद सभी पैकेट का वजन तराजू पर मापा और देखा कि क्या कम्पनी द्वारा दी गई मात्राओं से, ये लिए गए माप मेल खाते हैं या नहीं। जब जितनी मात्रा पैकेट पर लिखी थी, उतनी ही वजन करने पर मिली तो ज्‍यादातर समूह खुश हुए। एक समूह को आश्चर्य व खुशी, दोनों हुए जब एक पैकेट का वजन उससे ज्‍यादा पाया जितना उस पर लिखा था। वहीं दूसरा समूह बहुत निराश हुआ क्योंकि वजन करने पर पता चला कि उत्पाद की जो मात्रा पैकेट पर लिखी थी, उससे कम थी। उनको लगा कि उनके साथ धोखा हुआ है और उन्होंने कहा, “कम्पनी ग्राहकों को भ्रमित कर रही थी, जितनी मात्रा कही गई है, उससे कम मात्रा बेचकर।” यद्यपि उन्होंने खुद सामग्री नहीं खरीदी थी, फिर भी उनमें धोखा होने की भावना पैदा होना रोचक था।

  • आगे हर बच्चे ने निम्नलिखित प्रश्नों के जवाब लिखे--
  • क्या आप सोचते हैं कि सामग्री बेचने वाली कम्पनी ईमानदार है?
  • पैकेट पर अन्य क्या सूचनाएँ दी गई थीं?
  • क्या कभी किसी ने आपके साथ बेईमानी की है? कैसा महसूस हुआ?
  • क्या आप कभी बेईमान थे? क्यों? इससे कैसा महसूस हुआ?

एक बार बच्चों ने स्वतंत्र रूप से अपनी शीट पर कार्य कर लिया, तो उसके बाद हर बच्चे को अपने अनुभवों व सीख को बाँटने का मौका दिया गया। उन्होंने इन बातों पर चर्चा की कि जब उनको किसी ने धोखा दिया तो कैसा महसूस किया, क्या वे खुद कभी बेईमान थे और क्यों। बातचीत के दौरान बच्चों ने बहुत ही खुलेपन-से साझा किया और माना कि डाँट या सज़ा मिलने के डर से उन्होंने बेईमानी की या बात छिपाई। आमतौर पर उन सबने ईमानदारी के मूल्य की सराहना की।

सत्र के दौरान भाषा की कुशलता, सुनना, बोलना, देखना, पढ़ना और लिखना - सभी को शामिल किया गया था। 

इस पूरी प्रक्रिया में बच्चे पूर्णत: तल्लीन और व्यस्त थे, और इस प्रकार उन्होंने जो सीखा, वो उनका अपना था। सत्र से पहले तैयारी करने और प्रश्नों व कठिनाइयों के बारे में पहले से सोच लेने से मुझे मदद मिली। मैं बच्चों का ध्यान से अवलोकन कर पाई और ज़रूरत पड़ने पर उपयुक्त सहयोग व मदद दे पाई।

कहानी सत्र के बाद उनके शिक्षक बहुत खुश थे। उनको लगा कि मापन विषय में प्रवेश करने के लिए, यह एक उत्कृष्ट तरीका है, जिसे वे शुरू करने की योजना बना रही थीं। उन्होंने कहा कि वह मापन की अलग इकाइयों, गुणकों व उपगुणकों को जोड़ते हुए कहानी को आगे बढ़ाएँगी। उन्होंने विषय की शुरुआत का फैसला भी बदला और लम्बाई की बजाय (जैसी कि उन्होंने पहले योजना बनाई थी) भार से शुरू करने का निर्णय लिया।

बहुत-से शिक्षक शिकायत करते हैं कि कोर्स बहुत ज्‍यादा है और उन्हें कहानी या गतिविधियों का समय नहीं मिलता। लेकिन यह गतिविधि देखकर उन्हें लगा कि यदि विषय-शिक्षक एक साथ बैठकर विभिन्न विषयों में आपसी सम्बन्धों पर काम करें एवं कम-से-कम दो विषयों को प्रत्येक कहानी से जोड़ें तो कोर्स को पूरा करने में कम समय लगेगा। एक विषय से दूसरे विषय में जाने में भी आसानी होगी और गणित की विभिन्न अवधारणाएँ कहानी के पात्रों द्वारा वास्तविक जीवन या काल्पनिक समस्याओं का सामना करते हुए समझी जा सकती हैं। इस प्रकार ये प्रासंगिक व सार्थक भी बन जाएँगी।

कुल मिलाकर सीखना एक सार्थक व एकीकृत अनुभव होगा - शिक्षकों और बच्चों, दोनों के लिए।


सीमा वाही मुखर्जी : शिक्षक, कथावाचक, शिक्षा सलाहकार। स्कूलों और देशभर की अन्य संस्थाओं में स्टोरी टेलिंग की कार्यशालाएँ करती हैं और साथ ही इसका प्रशिक्षण भी देती हैं। आप मानती हैं कि स्कूलों और संस्थाओं में बच्चों के लिए भावनात्मक रूप से सुरक्षित माहौल मिलना चाहिए जहाँ बच्चों के बारे में कोई धारणा बनाए बिना, उनको स्वीकार कर लिया जाए ताकि वे अपनी क्षमताओं के अनुरूप अच्छे-से सीख पाएँ। बच्चों में किताबें पढ़ने की आदत पैदा करना और उसे बढ़ावा देना, इनकी रुचि का विषय है। गुड़गाँव, हरियाणा में निवास।

अँग्रेजी से अनुवाद : नीरांजना दुबे : भूविज्ञान में पीएच.डी., मेंटल रिटार्डेशन में डिप्लोमा। शिक्षा में रुचि है। वर्तमान में बेंगलूरु में निवास।

सभी फोटो : सीमा वाही मुखर्जी।

शैक्षणिक संदर्भ अंक 112 से साभार

http://teachersofindia.org/

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