Tuesday, March 31, 2015

ब्लाक संसाधन केन्द्र (BRC) एवं नगर संसाधन केन्द्र (URC) पर रखे गये डॉटा एन्ट्री आपरेटर के मानदेय हेतु अवशेष धनराशि तथा निर्देश प्रेषण के सम्बन्ध में आदेश जारी |

ब्लाक संसाधन केन्द्र (BRC) एवं नगर संसाधन केन्द्र (URC) पर रखे गये डॉटा एन्ट्री आपरेटर के मानदेय हेतु अवशेष धनराशि तथा निर्देश प्रेषण के सम्बन्ध में आदेश जारी |

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स्कूलों की नई समय सारिणी प्रसांगिक नहीं : प्राथमिक शिक्षक संघ के प्रदेश अध्यक्ष लल्लन मिश्र ने कहा कि 1अप्रैल 2015 से शुरू सत्र में ज्यादा परेशानी बच्चों को होगा-

स्कूलों की नई समय सारिणी प्रसांगिक नहीं : प्राथमिक शिक्षक संघ के प्रदेश अध्यक्ष लल्लन मिश्र ने कहा कि 1अप्रैल 2015 से शुरू सत्र में ज्यादा परेशानी बच्चों को होगा-

उरई : प्राथमिक शिक्षक संघ के प्रदेश अध्यक्ष लल्लन मिश्र ने कहा कि 1 अप्रैल से शुरू हो रहे शिक्षा के नये सत्र से सबसे ज्यादा परेशानी बच्चों को होगी।

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कल से खुल जाएंगे परिषदीय स्कूल : परिषदीय स्कूलों का समय सुबह 9 से अपराह्न 3 बजे तक रखा गया |

तमाम इलाकों में अप्रैल से मई तक भीषण गर्मी पड़ती है लिहाजा इन हालातों में बच्चों की सेहत खराब हो सकती है, लिहाजा नई व्यवस्था का प्राथमिक शिक्षक संघ द्वारा बच्चों के हित में पुरजोर विरोध किया जाएगा।

प्राथमिक शिक्षक संघ के प्रदेश अध्यक्ष लल्लन मिश्र ने प्रेस वार्ता के दौरान यह बात कही। उन्होंने कहा कि सरकार शिक्षकों की समस्याओं के प्रति संवेदनशील है। हाल ही में सरकार ने न सिर्फ वेतन विसंगतियों को दूर किया बल्कि पदोन्नति का समय पांच वर्ष से घटाकर चार वर्ष कर दिया।

उन्होंने उम्मीद जतायी कि भीषण गर्मी को देखते हुए विद्यालय समय परिवर्तन हेतु बेसिक शिक्षा परिषद द्वारा शासन के पास प्रस्ताव भेजा गया है। उन्होंने कहा कि यदि सरकार प्रस्ताव को स्वीकार नहीं करती है तो आगे की रणनीति बनायी जाएगी।

चूंकि 1 अप्रैल से नया शिक्षा सत्र शुरू करने के साथ सुबह नौ बजे स्कूल खोलने का शासनादेश जारी हुआ है लिहाजा उसे अमल में लाया जाएगा। सरकार ने बच्चों के हित के हित में समय परिवर्तन नहीं किया तो प्राथमिक शिक्षक संघ द्वारा आंदोलन का सहारा लिया जाएगा।

इस दौरान मुख्य रूप से प्रदेश महामंत्री सुरेंद्र सिंह यादव, वरिष्ठ उपाध्यक्ष दिनेश शर्मा, कोषाध्यक्ष संजय सिंह जिलाध्यक्ष महेंद्र सिंह भाटिया, संजय दुबे, रामराजा द्विवेदी, हरी सिंह राजपूत, युद्धवीर कंथरिया, राघवेंद्र निरंजन, राममोहन वाजपेयी, जयनारायण ओझा, अरुण सिंह निरंजन, नरेंद्र निरंजन आदि मौजूद रहे।

        खबर साभार : दैनिकजागरण

प्राइवेट स्कूलों की तर्ज पर मॉडल स्कूल बनाने की सूबे के सीएम की महत्वकांक्षी योजना : 13 करोड़ से बनेगा अभिनव विद्यालय-

प्राइवेट स्कूलों की तर्ज पर मॉडल स्कूल बनाने की सूबे के सीएम की महत्वकांक्षी योजना : 13 करोड़ से बनेगा अभिनव विद्यालय-

लखनऊ : प्राइवेट स्कूलों की तर्ज पर मॉडल स्कूल बनाने की सीएम की महत्वकांक्षी योजना एक कदम और आगे बढ़ गई है। सोमवार को डीएम की अध्यक्षता में हुई बैठक में फैसला लिया गया है कि इसे 13 करोड़ 26 लाख रुपये की लागत से अभिनव विद्यालय बनवाया जाएगा। राजधानी में अभिनव विद्यालय का निर्माण कराया जाएगा। यह बेसिक शिक्षा विभाग के अंतर्गत संचालित होगा। यह स्कूल मड़ियांव छावनी स्थित प्राथमिक विद्यालय की खाली जमीन पर बनाया जाएगा।

         खबर साभार : नवभारत टाइम्स

बेसिक शिक्षा विभाग आज लगाएगा आरटीई फेस्ट : विभाग के शिक्षक और कर्मचारी लोगों को 'राइट टू एजुकेशन' के लिए करेंगे प्रेरित-

बेसिक शिक्षा विभाग आज लगाएगा आरटीई फेस्ट : विभाग के शिक्षक और कर्मचारी लोगों को 'राइट टू एजुकेशन' के लिए करेंगे प्रेरित-

लखनऊ : बेसिक शिक्षा विभाग की ओर से प्राथमिक विद्यालय निरालानगर में मंगलवार को राइट टू एजुकेशन फेस्ट का आयोजन किया जा रहा है। इस मौके पर विभाग के शिक्षक और कर्मचारी लोगों को राइट टू एजुकेशन के लिए प्रेरित करेंगे। साथ ही जो व्यक्ति आरटीई के तहत दाखिला करवाना चाहता है तो वह भी इस फेस्ट में शामिल होकर आवेदन कर सकता है। अगर आरटीई के तहत दाखिले में किसी को भी समस्या आ रही है तो इस फेस्ट में उसकी समस्या का समाधान कर उसके बच्चे का दाखिला करवाया जाएगा। शिक्षा विभाग के कर्मी विभिन्न स्टॉल्स पर एडमिशन प्रोसेस और अन्य जानकारी उपलब्ध करवाएंगे।

पपेट शो से फैलाएंगे जागरूकता-

बेसिक शिक्षा अधिकारी प्रवीणमणि त्रिपाठी ने बताया कि यह फेस्ट सुबह 11 बजे शुरू किया जाएगा। इसमें सबसे पहले पपेट शो होगा। इसके जरिए लोगों को शिक्षा के प्रति जागरूक किया जाएगा। साथ ही आरटीई की जानकारी भी दी जाएगी। इसके अलावा प्रॉजेक्टर से बच्चों को शॉर्ट फिल्में भी दिखाई जाएंगी, जिसमें सर्व शिक्षा अभियान से जुड़ी चीजे होंगे। कार्यक्रम में कुल छह स्टॉल होंगे। इसमें बालिका शिक्षा, समेकित शिक्षा, प्रशिक्षण, समसामायिक सहभागिता, स्वास्थ्य कैंप और किशोरी सुरक्षा के स्टॉल होंगे। इसके अलावा अल्पसंख्यक विभाग को भी स्टॉल के लिए आमंत्रित किया गया है।

         खबर साभार : नवभारत टाइम्स

अपनी पहचान को भी खत्म कर देती है नकल की आदत;बचपन से ही हम अपने आस पास के लोगों के अनुभवों.........

अपनी पहचान को भी खत्म कर देती है नकल की आदत;बचपन से ही हम अपने आस पास के लोगों के अनुभवों.........

नकल बचपन से एक कहावत हम सब सुनते आए हैं की नकल अक्ल से होती है। मतलब नकल करने के लिए अक्ल जरूरी है। किसी न किसी तरह से, कभी न कभी हम सब नकल करते हैं। जिसे नकल से कुछ नया सीखने की आदत लग जाए, तो वह सफलता की एक नई कहानियां लिख देता है। जिसे सिर्फ नकल करने की आदत लग जाए तो यह आदत दिमाग की तरह व्यक्ति के व्यक्तित्व को खत्म कर देती है। ऐसे व्यक्ति की खुद की पहचान खत्म हो जाती है। यह व्यक्ति को तय करना होता है वह उसे किस तरह से लेता है।

क्लिक कर पढ़ें-प्राथमिक शिक्षा की पृष्ठभूमि को गर्त में धकेल रहा विदेशी मॉडल : रमेश ठाकुर |

ऐसे ही सीखते आए हैं हम : हमने सुन-सुन कर सुनना सीखा है, बोल-बोल कर बोलना व पढ़-पढ़ कर ही पढ़ना सीखा है। बचपन से ही हम अपने आस पास के लोगों के अनुभवों से सीख कर ही आगे बढ़ते हैं। किसी को हम फॉलो करते हैं, तो कोई हमें फॉलो करता है। सीखने व जानने की पक्रिया ऐसे ही आगे बढ़ती है। किसी न किसी रूप में , कभी न कभी हम एक दूसरे की नकल जरूर करते हैं। कुछ नया सीखने के लिए अगर हम नकल करते हैं तो अच्छा है।

दो तरह से होती है नकल : असल में नकल भी दो तरह की होती है, जब हम अपने विकास के लिए किसी दूसरे का अनुसरण करते हैं, उसकी नकल करते हैं, उस जैसा करने की नहीं। उससे बेहतर करने की कोशिश करते हैं तो यह अच्छा है। दुनिया में एक व्यक्ति को नई सोच का जीनियस कहा गया। स्टीव जॉब ने अपने जीवन में कोई नई खोज नहीं की, बल्कि जो कुछ भी उपलब्ध था, उसे और बेहतरीन बना दिया। उसे इतना बेहतर बना दिया कि अब दुनिया की हर मोबाइल कंपनी उसका अनुसरण करना चाहती है। वैसा उत्पाद बनाना चाहती है। इसलिए इस तरह की नकल जीवन में हम एक बार नहीं सौ बार भी करें तो अच्छा है।

व्यक्ति की पहचान को खत्म कर देती है नकल : नकल व्यक्ति के व्यक्तित्व व उसकी पहचान को भी खत्म कर देती है। अगर हम सिर्फ नकल करते हैं तब हम कुछ नया हासिल करना तो दूर जो हमारे पास होता है, उसे भी खत्म कर देते हैं। जब दुनिया की कोई कंपनी सिर्फ दूसरों की नकल करना शुरू कर देती है, तब वह अपने आप को खो रही होती है। कुछ नया करने को खो देती है। अपने ग्राहकों को खो देती है। अपनी पहचान बनाए रखने के लिए नकल को अक्ल से करना जरूरी है।

आने वाली पीढ़ियों को खत्म कर देगी यह नकल  : पिछले दिनों देश भर के स्कूलों में एग्जाम चल रहे थे। नकल करने की जो तस्वीरें सामने आई, ये तस्वीरें कोई नई नहीं थी। देश के कई राज्यों में हालात बद से बदतर हैं। आजादी के लगभग सात दशक के बाद भी स्कूल कॉलेजों में नकल करने की स्थिति में कोई ज्यादा सुधार नहीं है। यह पवृत्ति आने वाली पीढ़ियों को खत्म कर रही है। स्कूल व कॉलेज के दिनों में हमें जिस भी विषय में नकल करने की आदत हो गई, वह विषय कभी भी हमारा प्रिय विषय नहीं बन सका। उसे न हम समझ सके न ही जान सके। जब हम नकल करना शुरू कर देते हैं तो नया सीखना बंद कर देते हैं।

नजर बस नकल करने पर रह जाती है : जिन लोगों को जीवन में सिर्फ नकल करने की आदत हो जाती है वे कभी विास के साथ कोई काम नहीं कर पाते। उनका पूरा ध्यान सिर्फ इधर- उधर देखने पर होता है। वे दूसरों को ही देखते रहते हैं। कुछ लोग आस पास आपको जरूर ऐसे मिलेंगे, उनके सामने आप कुछ भी करेंगे वे उसे भी नकल करने की कोशिश करेंगे। ऐसे लोगों को व्यक्तित्व असहाय की तरह होता है, जो हर कार्य में फिर सिर्फ दूसरों से मदद की अपेक्षा करते हैं।

          लेख : डॉ अशोक कुमार        

प्राथमिक शिक्षा की पृष्ठभूमि को गर्त में धकेल रहा विदेशी मॉडल : रमेश ठाकुर-

प्राथमिक शिक्षा की पृष्ठभूमि को गर्त में धकेल रहा विदेशी मॉडल : रमेश ठाकुर-

प्राथमिक शिक्षा की बढ़ी मांग के अनुरूप अनुमानित बजट का जो प्रावधान किया जाता है, वह निश्चित ही इतना कम होता है कि राज्य सरकारें सदैव ही बजट की कमी बताते हुए अल्प वेतन अथवा ठेके पर शिक्षा कर्मियों की भर्ती करके प्राथमिक शिक्षण की खानापूरी करती हैं।

देश की आजादी के बाद राष्ट्रीय विकास के लिए जिस विदेशी मॉडल का अनुकरण किया गया, उसने हमारी मातृभाषा से जुड़ी प्राथमिक शिक्षा की पृष्ठभूमि को गर्त में धकेल दिया। आज मैकाले शिक्षा पद्धति से जुड़ी अंग्रेजी शिक्षा आत्मसम्मान का साधन बन गई। पहले तो राज्यों में केवल सरकारी स्कूल ही हुआ करते थे और उनमें पढ़कर निकले बच्चे प्रत्येक क्षेत्रों में सफलता का परचम लहराते थे। आज शिक्षा का अधिकार कानून को लेकर निजी स्कूल चौराहे पर खड़े हैं और संपन्न व निर्धन वर्ग के अभिभावक दुविधा में हैं।

भारतीय संसद ने इस कानून को पारित करके बेहतरीन कार्य तो किया, लेकिन लगता है कि इसके नियम-उपनियम गरीब बच्चों के भविष्य की अनदेखी करके बनाए गए हैं। अभिभावकों की भावनाओं और निजी स्कूलों के हित को भी नजरअंदाज किया गया है। अक्सर देखा जाता है कि अभावग्रस्त एवं दुर्बल श्रेणी के लोग मल्टीप्लेक्स, मॉल, संस्कृति, प्रतिष्ठित शोरूम व होटलों में हीनभावना व उपेक्षा की वजह से नहीं जा पाते हैं। वे उच्च वर्ग के सम्मुख असहज महसूस करते हैं। निर्धन अभिभावक अधिकांशत: अशिक्षित होते हैं। अमीर व गरीब वर्ग के बच्चों की मित्रता व संगत भी भिन्न होती है। ऐसे में इनके मध्य तालमेल कैसे होगा? यह निचले वर्ग के बच्चों के लिए ही अधिक घातक सिद्ध हो सकता है।

कई स्कूल शिक्षा के अधिकार के तहत गरीब बच्चों को पढ़ाने के लिए अलग से प्रबंध कर रहे हैं, जोकि गलत है। इस कानून के क्रियान्वयन में कड़वा सच तो यह है कि अमीर-निर्धन वर्गों में आर्थिक एवं सामाजिक फासले के चलते कई जनप्रतिनिधि, अधिकारी व धनी वर्ग बच्चों को एक साथ पढ़ाने के खिलाफ हैं। निजी स्कूलों की भी यही राय लगती है। उपेक्षित गरीब अभिभावक भी अपने बच्चों को प्रवेश दिलाने में कतरा रहे हैं। इन्हें अन्य भारी खर्चे, भेदभाव, अवहेलना की चिंता सता रही है।

हालांकि किसी भी स्कूल की स्थापना का मुख्य उद्देश्य बिना भेदभाव एवं जात-पात के समानता से शिक्षा देना होता है, लेकिन यह आज की कड़वी सच्चाई है कि शिक्षा व्यावसायिक हो गई है और बच्चों के बीच धन के आधार पर भेदभाव कर रही है। वास्तविक दुर्बल वर्ग तो इस अधिकार से अभी भी दूर ही रहेंगे। इन्हें तो यह भी नहीं पता कि शिक्षा का अधिकार होता क्या है? इस कानून में आय के पैमाने को एक लाख के करीब लाकर ही असल हकदार को हक दिया जा सकेगा। शिक्षा के अधिकार को जिस तरह से लागू किया जा रहा है, उससे लगता है कि सरकार शिक्षा में अपनी असफलता छिपाने और जिम्मेदारी से भागने के लिए निजी स्कूलों पर नकेल कसना चाहती है।

सच्चाई यह है कि अगर सरकार की प्रबल इच्छाशक्ति एवं सख्त नीतियां हों तो वह सरकारी स्कूलों के चरमराए ढांचे को सुधारकर निजी स्कूलों के स्तर पर ला सकती है। केंद्रीय विद्यालय एवं नवोदय विद्यालय इसके बेहतरीन उदाहरण हैं, जिनका परीक्षा परिणाम अनेक निजी स्कूलों से बेहतर रहता है। सरकारी शिक्षा के उत्थान के लिए पहला कदम यह होना चाहिए कि करोड़ों-अरबों की धनराशि के बजट का अधिकांश हिस्सा शिक्षा की गुणवत्ता और बच्चों में मुफ्त कॉपी-किताबों, ड्रेस, बैग वितरण पर खर्च हो, न कि इन्हें मुफ्तखोरी की आदत डालकर भोजन कराया जाए।

पिछले चार वर्षों में शिक्षा पर दोगुना बजट बढ़ा है। इस वर्ष भी केंद्रीय वित्त मंत्री ने अगले वित्त वर्ष के बजट में शिक्षा के लिए आवंटन में 21.7 फीसदी की बढ़ोतरी की है। इतनी धनराशि अगर सही तरह से खर्च होती तो निजी स्कूलों पर शिक्षा के अधिकार के तहत दबाव डालने की नौबत ही नहीं आती। जिस तरह से सरकार ने शिक्षा का अधिकार दिया है, उससे कोई खास लाभ नहीं होगा। अब सरकार को यह भी समीक्षा करनी चाहिए कि इस अधिकार को कितने निजी स्कूलों ने किस-किस तरह से और कितना लागू किया है। किंतु मूलभूत आवश्यकता यह है कि सरकारी स्कूलों को सुधारा जाए। एक उपाय यह किया जा सकता है कि सभी अधिकारियों के बच्चों को सरकारी स्कूल में पढ़ाने का कानून बनाया जाए ताकि सरकारी स्कूलों में भी आधुनिक सुविधाएं और शैक्षणिक गुणवत्ता आए|

   खबर साभार/लेख : डीएनए/रमेश ठाकुर

SSA के अन्तर्गत वर्ष 2014-15 में परिषदीय प्रथमिक/उच्च प्राथमिक विद्यालयों के अक्रियाशील शौचालयों के क्रियाशील (Toilet Maintenance) बनाने हेतु धन अवमुक्त किये जाने के समबन्ध में शासनादेश जारी-

SSA के अन्तर्गत वर्ष 2014-15 में परिषदीय प्रथमिक/उच्च प्राथमिक विद्यालयों के अक्रियाशील शौचालयों के क्रियाशील (Toilet Maintenance) बनाने हेतु धन अवमुक्त किये जाने के समबन्ध में शासनादेश जारी-

शौचालयों के नये निर्माण के सम्बन्ध में आदेश पत्र (यहां) क्लिक कर डाउनलोड करें |

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1-SSA के अन्तर्गत वर्ष 2014-15 में परिषदीय प्रथमिक/उच्च प्राथमिक विद्यालयों के शौचालयों के निर्माण (Toilet construction) किये जाने के समबन्ध में शासनादेश जारी |

2-वर्ष 2014-15 में स्वीकृत अतिरिक्त कक्षा-कक्षों के निर्माण हेतु धनराशि आंवटन के सम्बन्ध में शासनादेश जारी |

हर शिक्षा सत्र में रसोइयों के चयन का विरोध : प्रदेश सरकार से मांग की है कि एक हजार की जगह पांच हजार रुपये मासिक दिया जाए अनुदान;अनुसूचित प्रा0स्कूलों के लिए अनुदान की मांग-

हर शिक्षा सत्र में रसोइयों के चयन का विरोध : प्रदेश सरकार से मांग की है कि एक हजार की जगह पांच हजार रुपये मासिक दिया जाए अनुदान;अनुसूचित प्रा0स्कूलों के लिए अनुदान की मांग-

लखनऊ। हर शिक्षा सत्र में रसोइयों के चयन का विरोध करते हुए प्राथमिक विद्यालय रसोइया वेलफेयर एसोसिएशन के लोगों ने सोमवार को प्रदर्शन कर धरना दिया। लक्ष्मण मेला मैदान में जिलाध्यक्ष ऊषा देवी का कहना है कि पाल्य व्यवस्था का बहाना कर निकाले जाने के साथ ही नई चयन प्रक्रिया से रसोइए शोषण का शिकार हो रहे हैं। उन्होंने प्रदेश सरकार से मांग की है कि एक हजार की जगह पांच हजार रुपये मासिक अनुदान दिया जाए।

अनुसूचित प्राथमिक विद्यालयों को अनुदानित करने की मांग-

लखनऊ। अनुसूचित प्राथमिक मान्यता प्राप्त विद्यालयों को अनुदान पर लेने की मांग को लेकर शिक्षकों ने धरना-प्रदर्शन किया। अनुसूचित प्राथमिक शिक्षक कल्याण सेवा समिति संयुक्त महासंघ के तत्वावधान में प्रदेश भर से गांधी प्रतिमा पर जुटे अनुसूचित प्राथमिक शिक्षकों ने प्रदर्शन करते हुए अनुसूचित प्राथमिक मान्यता प्राप्त विद्यालयों को अनुदान पर लेने की मांग की।

          खबर साभार : अमरउजाला



दयानन्द त्रिपाठी

कल से खुल जाएंगे परिषदीय स्कूल : परिषदीय स्कूलों का समय सुबह 9 से अपराह्न 3 बजे तक रखा गया-

कल से खुल जाएंगे परिषदीय स्कूल : परिषदीय स्कूलों का समय सुबह 9 से अपराह्न 3 बजे तक रखा गया-

लखनऊ (ब्यूरो)। बेसिक व माध्यमिक शिक्षा परिषद के स्कूल बुधवार से खुल जाएंगे। परिषदीय स्कूलों का समय सुबह 9 से अपराह्न 3 बजे तक रखा गया है। बेसिक शिक्षा परिषद के निदेशक डीबी शर्मा ने बेसिक शिक्षा अधिकारियों को इसके लिए जरूरी तैयारियां करने के निर्देश दिए हैं। स्कूल खुलने से पहले इनकी सफाई कराने को कहा गया है। इसी तरह जिला विद्यालय निरीक्षकों को निर्देश दिया गया है कि स्कूल खोलने की सभी तैयारियां करा ली जाएं जिससे छात्र-छात्राओं को कोई असुविधा न हो।

         खबर साभार : अमरउजाला/दैनिकजागरण



दयानन्द त्रिपाठी

SSA के अन्तर्गत वर्ष 2014-15 में परिषदीय प्रथमिक/उच्च प्राथमिक विद्यालयों के शौचालयों के निर्माण (Toilet construction) किये जाने के समबन्ध में शासनादेश जारी-

SSA के अन्तर्गत वर्ष 2014-15 में परिषदीय प्रथमिक/उच्च प्राथमिक विद्यालयों के शौचालयों के निर्माण (Toilet construction) किये जाने के समबन्ध में शासनादेश जारी-

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वर्ष 2014-15 में स्वीकृत अतिरिक्त कक्षा-कक्षों के निर्माण हेतु धनराशि आंवटन के सम्बन्ध में शासनादेश जारी |

परिषदीय शिक्षकों को ग़ैर शैक्षणिक कार्यों में न लगाए जाने के सम्बन्ध में माननीय उच्च न्यायालाय इलाहाबाद का आदेश देखें-

परिषदीय शिक्षकों को ग़ैर शैक्षणिक कार्यों में न लगाए जाने के सम्बन्ध में माननीय उच्च न्यायालाय इलाहाबाद का आदेश देखें-

HIGH COURT OF JUDICATURE AT ALLAHABAD

AFR :-Chief Justice's

Court Case :- PUBLIC INTEREST LITIGATION (PIL) No. - 11028 of 2015

Petitioner :- Sunita Sharma Advocate High Court & Another Respondent :- State Of U.P. & 3 Others

Counsel for Petitioner :- V.C. Srivastava,Tahir Husain

Counsel for Respondent :- C.S.C.,A.K. Yadav

Hon'ble Dr. Dhananjaya Yeshwant Chandrachud,Chief Justice
Hon'ble Pradeep Kumar Singh Baghel,J. 

The first petitioner, who is a practicing Advocate and the second petitioner who is a former Corporator of the Nagar Nigam, have filed these proceedings in the public interest complaining of the legality of a communication dated 2 February 2015 of the Additional District Magistrate (Civil Supplies), Allahabad, stating that in pursuance of the directions of the Chief Secretary, the work of verification of card holding families on the basis of criteria for inclusion and exclusion under the National Food Security Act, 2013 would be carried out. This letter of the ADM (Civil Supplies) was issued in pursuance of a direction of the Chief Secretary dated 23 January 2015 which has been annexed to the counter affidavit. In pursuance thereof, teachers of primary schools and junior high schools have been called upon to participate in the work of verification of eligible families. This process was directed to be completed between 2 February 2015 and 27 February 2015. The submission of the petitioners is that entrusting this work to primary teachers and teachers of the junior high schools is contrary to law. Hence a mandamus had been sought directing the State to exclude such teachers who were engaged for verification of ration cards in the district of Allahabad.

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प्रदेश के प्राइमरी एवं जूनियर हाईस्कूल के शिक्षकों से अध्ययन के अलावा अन्य कार्य लिया जाना अवैध : इलाहाबाद हाईकोर्ट; श्री लल्लन मिश्र अध्यक्ष-उत्तर प्रदेशीय प्राथमिक शिक्षक संघ ने किया स्वागत |

On 24 February 2015, this Court directed the Standing Counsel to take instructions and to explain the reason for withdrawing the services of teachers for the purpose of carrying out the work of verification in connection with ration cards. Subsequently on 27 February 2015, the District Magistrate was directed to file a counter affidavit, explaining the provisions of law under which the services of teachers of primary schools have been requisitioned for carrying out the above work. A counter affidavit has been filed by the District Supply Officer, in which it has been stated that initially, it was anticipated that there were about seventeen lac card holders in the district, whereas subsequently it was found that there were nearly forty lac card holders. The State Government considered that for the purpose of verification, it is necessary to involve employees of the State drawn from various departments, who were accordingly called upon to complete the programme within a fixed period. Insofar as the services of teachers are concerned, it has been stated that they were involved in the process on a clear understanding that they would participate as and when they are free from their duties at the schools.

The right of children to free and compulsory education between the age of six to fourteen has been statutorily recognized in Section 3(1) of the Right of Children to Free and Compulsory Education Act, 20091. This is in pursuance of the fundamental right conferred by Article 21-A of the Constitution of India. The Act provides in Chapter IV the responsibilities of schools and teachers. Section 27 specifically contains a prohibition on the deployment of teachers for non-educational purposes. Under Section 27, no teacher shall be deployed for any non-educational purposes other than the decennial population census, disaster relief duties or duties relating to elections to the local authority, or to the State Legislatures or Parliament, as the case may be. In view of this statutory prohibition, it is clearly unlawful and ultra vires on the part of the State to requisition the services of teachers for carrying out the verification of eligible card holding families. The right to free and compulsory education for children below the age of 14 is a constitutionally protected entitlement which is statutorily recognized in the Act. The State is not powerless, if it requires hands for completing the work of verification by recruiting contract employees or making suitable alternate arrangements, but such arrangements cannot involve the deployment of teachers. The duties of teachers is simply to teach students. Their status cannot be reduced to that of a ministerial employee of the State. It is no answer to state, as the District Supply Officer has in the counter affidavit, that the teachers are called upon to do the work of verification as and when they are free from school duties. A teacher after the completion of the hours of work in a school is expected to spend time in preparing for the classes for the next day and to pursue his or her own process of enhancing knowledge and learning to impart education to the children. It requires no stretch of imagination to hold that burdening a teacher with duties, after school hours in carrying out ministerial duties, such as the verification of eligible families, would only detract from her ability and capacity to teach students. It is time for the State to realise, if it is serious about implementing the right to free and compulsory education for children between ages of six to fourteen in the State of Uttar Pradesh that teachers cannot be treated in such a casual and callous manner. The civility of a society is defined with reference to the value it places on education and the respect which it holds for its teachers. Those may be traditional values but fortunately, some values are eternal. The position of a teacher is a critical element in dispensing education which must be recognized, protected and observed. Such action which has been taken by an officer of the State is clearly in violation of the duty cast upon the State. In fact, on a reading of the circular issued by the Chief Secretary on 23 January 2015, it is clear that no direction was contained therein to requisition the services of teachers. The Chief Secretary had, therefore, carefully not issued any such direction. What the District Administration has done is to follow a convenient method of requisitioning the services of teachers without the authority of law and, as we have noted earlier, it is in clear defiance of the mandate contained in Section 27 of the Act. The State must cease and desist from resorting to such unlawful behaviour.

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माननीय उच्च न्यायालय की "शिक्षा पर चिंता" और उसके आलोक में फैसले का आना "शिक्षक नेताओं" के लिए प्रश्न चिन्ह और चिन्तनीय विषय है कि इस फैसले पर सरकारों के सामने अपना पक्ष कैसे और किस आधार के बिना पर......

We, accordingly, allow the writ petition by directing that the State and the District Administration shall not requisition the services of the teachers in primary schools and junior high schools for carrying out such work which is without the authority of law. At the same time, the State and its agencies would be at liberty to make all appropriate arrangements including by recruiting contractual employees if it is so considered necessary for carrying out ministerial duties, such as the verification of eligible families for the allotment of ration cards.
 
The petition is, accordingly, disposed of. There shall be no order as to costs.

Order Date :- 25.3.2015
VMA
                                                                  (Dr. D.Y. Chandrachud, C.J.)  
                                                                          (P.K.S. Baghel, J.)

इलाहाबाद में महकमा के उच्च न्यायालय

AFR: -Chief न्याय

कोर्ट केस: - जनहित याचिका (पीआईएल) नंबर - 2015 के 11,028

याचिकाकर्ता: - सुनीता शर्मा एडवोकेट उच्च न्यायालय और एक अन्य प्रतिवादी: - उत्तर प्रदेश के राज्य और 3 अन्य

याचिकाकर्ता के वकील: - वी.सी. श्रीवास्तव, ताहिर हुसैन

प्रतिवादी के वकील: - C.S.C., A.K। यादव

माननीय डॉ धनंजय यशवंत चंद्रचूड़, चीफ जस्टिस
माननीय प्रदीप कुमार सिंह बघेल, जे।

एक अभ्यास अधिवक्ता और नगर निगम के एक पूर्व पार्षद है जो दूसरे याचिकाकर्ता है जो पहले याचिकाकर्ता, (अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट के 2 फ़रवरी 2015 दिनांक संचार की वैधता की जनता के हित शिकायत में नागरिक आपूर्ति इन कार्यवाही दायर की है ), इलाहाबाद, मुख्य सचिव, कार्ड राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत शामिल किए जाने और बहिष्कार के लिए मापदंड के आधार पर परिवारों के आयोजन की सत्यापन के काम के निर्देशों के अनुसरण में, 2013 से बाहर किया जाना होता है कि बताते हुए। एडीएम (नागरिक आपूर्ति) के इस पत्र काउंटर शपथ पत्र को कब्जे में लिया गया है जो 23 जनवरी 2015 दिनांकित मुख्य सचिव की दिशा के अनुसरण में जारी किया गया था। अनुसरण में क्या है, प्राथमिक विद्यालय और जूनियर हाई स्कूलों के शिक्षकों के पात्र परिवारों के सत्यापन के काम में भाग लेने का आह्वान किया गया है। इस प्रक्रिया को याचिकाकर्ताओं के प्रस्तुत जूनियर हाई स्कूलों के प्राथमिक शिक्षकों और शिक्षकों को इस काम सौंप कानून के विपरीत है कि 2015 के फरवरी 2 फ़रवरी 2015 और 27 के बीच पूरा किया जा करने के लिए निर्देशित किया गया था। इसलिए एक परमादेश इलाहाबाद जिले में राशन कार्ड के सत्यापन के लिए लगे हुए थे, जो इस तरह के शिक्षकों को बाहर करने के लिए राज्य निर्देशन की मांग की गई थी।

24 फ़रवरी 2015 को, इस कोर्ट निर्देश लेने के लिए और राशन कार्ड के संबंध में सत्यापन के काम से बाहर ले जाने के उद्देश्य के लिए शिक्षकों की सेवाएं वापस लेने के लिए कारण की व्याख्या करने के लिए स्थायी वकील का निर्देशन किया। इसके बाद 27 फ़रवरी 2015 पर, जिला मजिस्ट्रेट प्राथमिक विद्यालयों के शिक्षकों की सेवाओं के ऊपर काम से बाहर ले जाने के लिए मांग की गई है, जिसके तहत कानून के प्रावधानों को स्पष्ट करने के लिए एक काउंटर शपथ पत्र दायर करने का निर्देश दिया गया। एक काउंटर हलफनामा यह है कि यह लगभग चालीस लाख कार्ड धारकों वहाँ थे पाया गया कि बाद में, जबकि शुरू में, यह जिले में लगभग सत्रह लाख कार्ड धारकों वहाँ थे कि प्रत्याशित था कि कहा गया है, जिसमें जिला पूर्ति अधिकारी, द्वारा दायर की गई है। राज्य सरकार सत्यापन के प्रयोजन के लिए, यह तदनुसार एक निश्चित अवधि के भीतर इस कार्यक्रम को पूरा करने का आह्वान किया गया है जो विभिन्न विभागों से तैयार राज्य के कर्मचारियों को शामिल करने के लिए आवश्यक है कि माना जाता है। शिक्षकों की सेवाएं चिंतित हैं insofar के रूप में, यह है कि वे स्कूलों में अपने कर्तव्यों से मुक्त कर रहे हैं के रूप में और जब वे भाग होता है कि एक स्पष्ट समझ पर इस प्रक्रिया में शामिल किया गया है कि कहा गया है।

6-14 साल की उम्र के बीच नि: शुल्क और अनिवार्य शिक्षा के लिए बच्चों के अधिकार क़ानून (1) बच्चे के अधिकार को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार अधिनियम, यह द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकार के अनुसरण में है 20091. करने के लिए धारा 3 में स्वीकार किया गया है अनुच्छेद 21-ए में भारत के संविधान के। अधिनियम चतुर्थ अध्याय में स्कूलों और शिक्षकों की जिम्मेदारी प्रदान करता है। धारा 27 विशेष रूप से गैर-शैक्षिक उद्देश्यों के लिए शिक्षकों की तैनाती पर एक निषेध होता है। धारा 27 के तहत, कोई शिक्षक दस वर्ष जनगणना के अलावा अन्य किसी भी गैर-शैक्षिक उद्देश्यों के लिए तैनात किया जाएगा, मामले के रूप में आपदा राहत शुल्क या स्थानीय प्राधिकारी के लिए, या राज्य विधानमंडलों या संसद के चुनाव से संबंधित कर्तव्यों, हो सकता है। इस वैधानिक निषेध के विचार में, यह स्पष्ट रूप से पात्र कार्ड पकड़े परिवारों के सत्यापन के बाहर ले जाने के लिए शिक्षकों की सेवाएं माँग का राज्य की ओर से गैर कानूनी और अल्ट्रा अधीन है। 14 से कम उम्र के बच्चों के लिए मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार क़ानून के कानून में मान्यता प्राप्त है, जो एक संवैधानिक रूप से संरक्षित पात्रता है। यह उपयुक्त वैकल्पिक व्यवस्था अनुबंध कर्मचारियों की भर्ती या बनाकर सत्यापन का काम पूरा करने के लिए हाथ की आवश्यकता है, लेकिन इस तरह की व्यवस्था के शिक्षकों की तैनाती को शामिल नहीं कर सकते, तो राज्य, शक्तिहीन नहीं है। शिक्षकों के कर्तव्यों के छात्रों को पढ़ाने के लिए बस है। उनकी स्थिति राज्य के एक मंत्री कर्मचारी की है कि कम नहीं किया जा सकता है। जिला पूर्ति अधिकारी काउंटर हलफनामे में किया है के रूप में यह शिक्षकों के रूप में सत्यापन और जब वे स्कूल कर्तव्यों से मुक्त कर रहे हैं के काम करने पर कहा जाता है कि राज्य का कोई जवाब नहीं है। एक स्कूल में काम के घंटे के पूरा होने के बाद एक शिक्षक अगले दिन के लिए कक्षाओं के लिए तैयार करने में समय बिताने के लिए और ज्ञान को बढ़ाने और बच्चों को शिक्षा प्रदान करने के लिए सीखने के अपने या अपने प्रक्रिया को आगे बढ़ाने की उम्मीद है। यह इस तरह के पात्र परिवारों के सत्यापन के रूप में पद के कर्तव्यों से बाहर ले जाने में स्कूल के घंटों के बाद कर्तव्यों के साथ एक शिक्षक, बोझ, केवल उसकी क्षमता और छात्रों को पढ़ाने के लिए क्षमता से कम करना होगा कि पकड़ करने के लिए कल्पना का कोई खिंचाव की आवश्यकता है। ऐसा लगता है कि शिक्षकों को इस तरह के एक आकस्मिक और निर्दयी तरीके से इलाज नहीं किया जा सकता कि उत्तर प्रदेश के राज्य में 6-14 वर्ष की उम्र के बीच बच्चों के लिए नि: शुल्क करने का अधिकार और अनिवार्य शिक्षा को लागू करने के बारे में गंभीर है तो राज्य का एहसास करने के लिए समय है। एक ऐसे समाज की सभ्यता यह शिक्षा पर देता मूल्य और वह अपने शिक्षकों के लिए आयोजित करता है, जो सम्मान के संदर्भ में परिभाषित किया गया है। उन पारंपरिक मूल्यों में हो सकता है, लेकिन सौभाग्य से, कुछ मूल्यों अनन्त हैं। एक शिक्षक की स्थिति, मान्यता प्राप्त और संरक्षित मनाया जाना चाहिए जो शिक्षा के वितरण में एक महत्वपूर्ण तत्व है। राज्य के एक अधिकारी द्वारा लिया गया है जो इस तरह की कार्रवाई में राज्य की ड्यूटी पर डाली के उल्लंघन में स्पष्ट रूप से है। वास्तव में, 23 जनवरी 2015 को मुख्य सचिव द्वारा जारी किए गए परिपत्र के एक पढ़ने पर, यह कोई दिशा शिक्षकों की सेवाएं माँग का उसमें निहित था कि स्पष्ट है। मुख्य सचिव, इसलिए, ध्यान से किसी भी तरह के निर्देश जारी नहीं किया था। क्या जिला प्रशासन से किया है कि हम पहले भी उल्लेख किया है, के रूप में यह अधिनियम की धारा 27 में निहित जनादेश का स्पष्ट अवज्ञा में है, कानून के अधिकार के बिना शिक्षकों की सेवाएं requisitioning का एक सुविधाजनक विधि का पालन करने के लिए है और। राज्य संघर्ष और इस तरह के गैर कानूनी व्यवहार के लिए सहारा से विरत करना चाहिए।

हम तदनुसार, राज्य और जिला प्रशासन कानून के अधिकार के बिना है, जो इस तरह के काम से बाहर ले जाने के लिए प्राथमिक स्कूलों और जूनियर हाई स्कूलों में शिक्षकों की सेवाएं requisition नहीं होगा कि निर्देशन द्वारा रिट याचिका अनुमति देते हैं। एक ही समय में, राज्य और उसकी एजेंसियों यह इसलिए इस तरह के राशन कार्ड के आवंटन के लिए पात्र परिवारों के सत्यापन के रूप में पद के कर्तव्यों से बाहर ले जाने के लिए आवश्यक माना जाता है अगर संविदात्मक कर्मचारियों की भर्ती करके सहित सभी उचित व्यवस्था बनाने के लिए स्वतंत्रता पर होगा।

याचिका तदनुसार, निपटाया है। लागत के रूप में कोई आदेश नहीं किया जाएगा।

आदेश दिनांक: - 2015/03/25
VMA
(डा डी वाई चंद्रचूड़, मुख्य न्यायाधीश)
(पीकेएस बघेल, जे)

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